Shri Bhaktamal With Bhaktisabodhini Tika

Shri Priyadasaji

Hardcover • 848 Pages • ₹ 350.00 • Hindi • 9789369943449
No ratings yet
Publisher Gita Press, Gorakhpur
ISBN13 9789369943449
ASIN/SKU B0BGX3MSQB
Book Format Hardcover
Language Hindi
Pages 848
List Price ₹ 350.00
Publishing Date 06/07/2022
Dimensions 27 x 18.5 x 4 cm
Weight 1 kg 400 g
Book Code BD00070783

Discover Shri Bhaktamal With Bhaktisabodhini Tika by Shri Priyadasaji. This book is published by Gita Press, Gorakhpur in Hardcover format, ISBN 9789369943449, ASIN B0BGX3MSQB, under Religion and Spirituality, History of Religion, Hinduism.

Book Description

Shri Bhaktamal — Nabhadas's 1585 garland of 200+ great Vaishnava devotees, with Priyadasdas's comprehensive Bhakti Ras Bodhini commentary: the most complete single-volume account of the Hindu bhakti tradition's living history, containing saints whose lives demonstrate what genuine devotion actually looks like.

Nabhadas composed the Bhaktamal in 1585 CE in Sanskrit and Braj Bhasha — a "garland" (mala) of the great Vaishnava saints, from the Alvars of south India through the northern bhakti saints of the 15th and 16th centuries. His brief kavya characterizations of each saint were expanded by Priyadasdas in 1712 CE through the Bhakti Ras Bodhini — detailed commentary that turns each brief characterization into a complete devotional biography. The result covers Meera's love-madness for Krishna, Kabir's fierce non-dualism, Tulsidas's composition of the Ramcharitmanas, Surdas's blindness that saw Krishna so clearly, Raidas's transcendence of caste through devotion, Chaitanya's ecstatic sankirtana, and over 200 more — all with Priyadasdas's warm, detailed devotional commentary. {copies_once(0,0)}

200+ saintly biographies — the most comprehensive single-volume survey of Indian bhakti
Priyadasdas's Bhakti Ras Bodhini — detailed commentary on each saint's life and teaching
Saints covered: Meera, Kabir, Tulsidas, Surdas, Raidas, Chaitanya, Namdev, Eknath, Tukaram
Both traditions: Saguna and Nirguna bhakti saints from all regions and traditions
For: serious bhakti students, pravachan preparation, festivals, the permanent household library
इस संस्करण के विषय में

गीता प्रेस, गोरखपुर प्रकाशित यह हिन्दी संस्करण भारत के प्रत्येक हिन्दी-भाषी परिवार के लिये उपयोगी है। मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिन्दी अनुवाद — नित्य पाठ, सत्संग और पर्वों पर उपहार के लिये आदर्श।

Author Biography

Gita Press, Gorakhpur, established in 1923 under Gobind Bhawan Karyalaya, is one of the world's largest publishers of Hindu religious literature. For over a century it has published the Ramcharitmanas, the Bhagavad Gita, the Puranas, the Upanishads and thousands of devotional works in Hindi, Sanskrit and India's regional languages, guided by a not-for-profit mission to bring sacred texts into every home at the most affordable price. Its editions are valued for their textual accuracy, clear typesetting and durable, economical production.

Editorial Reviews

About this edition: A faithful Gita Press, Gorakhpur edition of Shri Bhaktamal with Bhaktisubodhini Tika. A revered work of the Hindu devotional and scriptural tradition, presented in Gita Press's trusted edition. Set in Hindi with the clear, accurate typesetting Gita Press is known for, printed on durable paper and produced for daily study and worship.

Book Summary

श्री भक्तमाल विद् भक्तिसुबोधिनी टीका भक्ति-परंपरा के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ भक्तमाल का विस्तृत टीकात्मक रूप है। भक्तमाल की मूल रचना नाभादास जी से संबद्ध मानी जाती है और बाद में प्रियादास जी ने उस पर विस्तृत टीका लिखकर इसमें वर्णित संतों, भक्तों और उनके आध्यात्मिक जीवन को समझने का एक समृद्ध मार्ग प्रदान किया। यह ग्रंथ केवल संतों की जीवन-कथाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा की जीवंत स्मृति, साधना, प्रेम, विनम्रता और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का साहित्यिक एवं आध्यात्मिक दस्तावेज है। भक्तिसुबोधिनी टीका के माध्यम से अनेक संक्षिप्त पदों और संकेतों को विस्तार मिलता है, जिससे पाठक संतों के जीवन, उनके चरित्र और उनकी भक्ति के विभिन्न रूपों को अधिक स्पष्टता से समझ पाता है।

भक्तमाल का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इसमें भक्ति को किसी एक वर्ग, जाति, क्षेत्र या सामाजिक स्थिति तक सीमित नहीं किया गया। इसमें विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए संतों और भक्तों की महिमा का वर्णन मिलता है। किसी ने ज्ञान के माध्यम से भगवान को खोजा, किसी ने प्रेम और विरह के माध्यम से, किसी ने नाम-स्मरण के द्वारा, किसी ने सेवा से और किसी ने अपने पूर्ण समर्पण से। इस विविधता से ग्रंथ का एक मूल संदेश सामने आता है—ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग केवल बाहरी पहचान से निर्धारित नहीं होता; भक्ति का वास्तविक मूल्य व्यक्ति के हृदय की भावना, श्रद्धा और समर्पण में है।

भक्तिसुबोधिनी टीका इस संदेश को समझने में विशेष सहायता करती है। भक्तमाल के मूल छप्पयों में अनेक संतों की कथा अत्यंत संक्षेप में संकेत रूप में आती है। यदि पाठक को उस संत की पृष्ठभूमि ज्ञात न हो, तो वह कई बार मूल कथन की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ सकता। प्रियादास जी की टीका इन संक्षिप्त संकेतों को खोलती है। वह संतों से जुड़ी कथाओं, उनके जीवन-प्रसंगों और उनकी भक्ति के विशेष स्वरूप को विस्तार देती है। इस कारण ग्रंथ केवल पढ़ने योग्य नहीं रहता, बल्कि संत-परंपरा को समझने का एक विस्तृत साधन बन जाता है।

ग्रंथ में संत-महिमा को विशेष स्थान दिया गया है। भक्तिमार्ग में संत को केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं माना जाता, बल्कि ऐसे जीवंत उदाहरण के रूप में देखा जाता है जिनके जीवन से मनुष्य भगवान के प्रति प्रेम करना सीख सकता है। संत स्वयं को महान सिद्ध करने की कोशिश नहीं करते; उनकी विशेषता उनके भीतर की विनम्रता, करुणा और ईश्वर-निष्ठा में दिखाई देती है। भक्तमाल में संतों की कथाएँ इसी कारण प्रेरणादायक बनती हैं। वे पाठक से केवल यह नहीं कहतीं कि भगवान को मानो, बल्कि यह दिखाती हैं कि भगवान को मानने वाला व्यक्ति अपने जीवन में किस प्रकार बदल सकता है।

भक्तमाल की परंपरा में नाम-स्मरण का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान के नाम को केवल उच्चारण नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का माध्यम माना गया है। सांसारिक जीवन में मनुष्य का मन अनेक दिशाओं में भटकता है। इच्छाएँ, भय, चिंता और मोह उसे लगातार खींचते रहते हैं। नाम-स्मरण मन को एकाग्र करने और भगवान की ओर लौटाने का साधन बनता है। संतों की कथाओं के माध्यम से यह विश्वास व्यक्त होता है कि जब नाम हृदय में उतर जाता है, तो साधारण जीवन भी आध्यात्मिक साधना बन सकता है।

इस ग्रंथ की एक बड़ी विशेषता भक्ति के अनेक रूपों का चित्रण है। किसी भक्त की भक्ति शांत और गंभीर है, तो किसी की अत्यंत भावपूर्ण। कहीं भगवान के प्रति दास्यभाव दिखाई देता है, कहीं सख्यभाव, कहीं वात्सल्य और कहीं माधुर्य। कहीं भक्त भगवान को अपना स्वामी मानकर सेवा करता है और कहीं प्रेम में उन्हें अपना अत्यंत निकट संबंधी समझता है। इस विविधता से स्पष्ट होता है कि भक्ति किसी एक भाव या पद्धति में बंद नहीं है। मनुष्य जिस भाव से ईश्वर के निकट अनुभव करता है, उसी भाव में उसकी साधना गहरी हो सकती है।

ग्रंथ में विनम्रता का महत्व बार-बार उभरता है। संत की पहचान उसकी प्रसिद्धि से नहीं बल्कि उसके अहंकार के क्षय से होती है। भक्ति का अर्थ केवल भगवान से कुछ माँगना नहीं, बल्कि अपने “मैं” को धीरे-धीरे हल्का करना भी है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, धन, पद, शक्ति या सामाजिक प्रतिष्ठा को ही अपनी पहचान मानता है, तब उसके भीतर अहंकार बढ़ सकता है। संतों का जीवन इसके विपरीत उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे उपलब्धियों के बावजूद स्वयं को भगवान का सेवक मानते हैं। यह विनम्रता उनके व्यक्तित्व को मानवीय और आत्मीय बनाती है।

सेवा भी भक्तमाल की भक्ति-दृष्टि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भगवान की सेवा और भगवान के भक्तों की सेवा को आध्यात्मिक जीवन से जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह है कि भक्ति केवल निजी अनुभव नहीं है। यदि भगवान के प्रति प्रेम वास्तविक है, तो उसका प्रभाव व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। दूसरों के प्रति करुणा, अतिथि का सम्मान, जरूरतमंद की सहायता और संतों के प्रति आदर—ये सब भक्ति की बाहरी अभिव्यक्तियाँ बन सकते हैं। इस दृष्टि से भक्तमाल की संत-कथाएँ मनुष्य को अधिक संवेदनशील बनने की प्रेरणा देती हैं।

ग्रंथ का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष विरह-भक्ति है। कई संतों की भक्ति में भगवान से मिलन की उत्कट इच्छा दिखाई देती है। भक्त भगवान को केवल किसी दूर स्थित सत्ता के रूप में नहीं देखता; वह उन्हें अपने जीवन का सबसे प्रिय संबंध मानता है। इसलिए भगवान की अनुपस्थिति भी उसके लिए गहरी अनुभूति बन जाती है। विरह में रोना, स्मरण करना और भगवान को पुकारना उसके लिए कमजोरी नहीं बल्कि प्रेम की तीव्रता का प्रमाण है। भारतीय भक्ति साहित्य में यह भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है और भक्तमाल में इसकी अनेक अभिव्यक्तियाँ दिखाई देती हैं।

भक्तमाल की संत-कथाएँ यह भी दिखाती हैं कि भक्ति और सामाजिक परिस्थितियाँ हमेशा एक जैसी नहीं रहीं। अनेक संतों को अपने समय की सामाजिक मान्यताओं, रूढ़ियों या विरोध का सामना करना पड़ा। कुछ संतों की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा उनके जन्म या सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उनकी साधना से बनी। यही कारण है कि भक्तमाल का संसार विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले भक्तों को एक आध्यात्मिक परिवार में स्थान देता है। यद्यपि ग्रंथ अपने समय की धार्मिक और सामाजिक भाषा से पूरी तरह अलग नहीं है, फिर भी संत-परंपरा का यह व्यापक दृष्टिकोण भारतीय भक्ति आंदोलन की महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाता है।

गुरु की भूमिका भी इस परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु केवल शास्त्र समझाने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि साधक को भक्ति के मार्ग पर स्थिर करने वाला मार्गदर्शक है। गुरु की कृपा से साधक को नाम, साधना और जीवन की सही दिशा प्राप्त होती है—ऐसा भक्तिपरंपरा में विश्वास है। भक्तमाल में संतों की जीवन-कथाओं के माध्यम से गुरु-शिष्य संबंध की गरिमा भी सामने आती है। गुरु के प्रति श्रद्धा केवल व्यक्ति-पूजा नहीं बल्कि उस आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा के प्रति सम्मान है जिसके माध्यम से भक्ति पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।

ग्रंथ में लीला और चमत्कार से जुड़े अनेक प्रसंग भी मिलते हैं। संत-जीवन की परंपरागत कथाओं में भगवान की कृपा को व्यक्त करने के लिए चमत्कारिक घटनाओं का वर्णन किया जाता है। आधुनिक पाठक इन कथाओं को अलग-अलग तरीकों से समझ सकता है। कोई उन्हें धार्मिक आस्था की दृष्टि से सत्य मान सकता है, तो कोई उन्हें संतों के प्रति श्रद्धा से विकसित हुई भक्तिपरक परंपरा के रूप में देख सकता है। इन कथाओं का आध्यात्मिक उद्देश्य प्रायः यह दिखाना है कि भक्त के जीवन में भगवान की कृपा अप्रत्याशित रूपों में प्रकट हो सकती है।

कर्म और कृपा के बीच संबंध भी पुस्तक के आध्यात्मिक संदेश में महत्वपूर्ण है। साधक को अपनी ओर से भक्ति, सेवा, नाम-स्मरण और सदाचार करना चाहिए, लेकिन अंतिम उपलब्धि को केवल अपने प्रयास का परिणाम नहीं माना जाता। भगवान की कृपा को निर्णायक माना जाता है। इस विचार से भक्त के भीतर विनम्रता आती है। वह अपनी साधना को उपलब्धि की तरह नहीं देखता, बल्कि भगवान की कृपा का अवसर मानता है।

भक्तिसुबोधिनी टीका की विशेष उपयोगिता यह है कि वह कथा को संदर्भ देती है। मूल भक्तमाल की भाषा और शैली में जो बातें संकेत के रूप में आती हैं, टीका उन्हें विस्तार देकर पाठक के सामने रखती है। इससे संतों के चरित्र अधिक जीवंत हो जाते हैं। पाठक केवल नामों की सूची नहीं पढ़ता; वह उनके संघर्ष, भक्ति, गुरु-परंपरा, भगवान के प्रति प्रेम और जीवन की परिस्थितियों को समझने का प्रयास कर सकता है। यही कारण है कि टीका सहित भक्तमाल भक्तिपरंपरा के अध्ययन के लिए विशेष महत्व रखता है।

इस ग्रंथ का एक गहरा संदेश साधारण जीवन में असाधारण भक्ति की संभावना है। संतों की कथाएँ यह संकेत देती हैं कि आध्यात्मिकता केवल वन, आश्रम या कठिन तपस्या तक सीमित नहीं है। गृहस्थ भी भक्त हो सकता है, सेवक भी भक्त हो सकता है, किसान, व्यापारी, राजा या सामान्य व्यक्ति भी भगवान के प्रति गहरा प्रेम रख सकता है। भक्ति का केंद्र बाहरी परिस्थिति नहीं बल्कि हृदय की दिशा है। यह विचार पुस्तक को आज के पाठक के लिए भी आत्मीय बनाता है।

आधुनिक जीवन में मनुष्य अक्सर सफलता, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत उपलब्धि को जीवन का केंद्र बना लेता है। भक्तमाल का संत-संसार इसके सामने एक अलग मूल्य-व्यवस्था प्रस्तुत करता है। यहाँ महानता का अर्थ प्रसिद्ध होना नहीं, बल्कि अपने भीतर प्रेम और विनम्रता विकसित करना है। व्यक्ति कितना धनवान है, कितना शक्तिशाली है या कितने लोग उसे जानते हैं—इन प्रश्नों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसके हृदय में करुणा कितनी है और उसका जीवन किस दिशा में जा रहा है।

अंततः श्री भक्तमाल विद् भक्तिसुबोधिनी टीका को केवल संतों की कथाओं का संग्रह मानना इसके महत्व को सीमित कर देगा। यह भारतीय भक्ति परंपरा की एक विशाल स्मृति है, जिसमें विभिन्न संतों के जीवन के माध्यम से प्रेम, नाम-स्मरण, गुरु-भक्ति, सेवा, विनम्रता, त्याग, विरह और ईश्वर-समर्पण के अनेक रूप सामने आते हैं। प्रियादास जी की टीका इन कथाओं को अधिक स्पष्ट और विस्तृत बनाती है तथा पाठक को मूल भक्तमाल के संकेतों के पीछे छिपे भक्तिपूर्ण संसार में प्रवेश करने का अवसर देती है।

इस पुस्तक का सबसे सुंदर मानवीय संदेश यह है कि भगवान की ओर जाने का मार्ग केवल ज्ञान या कर्म की जटिलता में नहीं, बल्कि हृदय की सच्चाई में भी खोजा जा सकता है। संतों की कथाएँ बार-बार बताती हैं कि प्रेम मनुष्य को बदल सकता है। जब भक्ति केवल शब्द न रहकर जीवन का अनुभव बनती है, तब व्यक्ति अधिक विनम्र, करुणामय और धैर्यवान हो सकता है। यही भक्तमाल की आत्मा है—संतों को पढ़ना केवल उनके जीवन के बारे में जानना नहीं, बल्कि अपने जीवन को उनके अनुभवों के प्रकाश में देखने का अवसर प्राप्त करना है। इसी कारण श्री भक्तमाल विद् भक्तिसुबोधिनी टीका आज भी भक्तिपरंपरा, संत-साहित्य और भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति को समझने वाले पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण और गहन ग्रंथ बना हुआ है।

Sample Chapters

Sample Chapters will be added soon…
Indian Books
Indian Books
Catalog Manager