Autobiography of A Yogi (Hindi)

Paramahansa Yogananda

Paperback • 544 Pages • ₹ 149.00 • Hindi • 9789389432473
No ratings yet
Publisher Fingerprint! Publishing
ISBN13 9789389432473
ASIN/SKU 9389432472
Book Format Paperback
Language Hindi
Pages 544
List Price ₹ 149.00
Publishing Date 01/09/2019
Dimensions 19.6 x 12.6 x 1.5 cm
Weight 450 g
Book Code BD00070736

Discover Autobiography of A Yogi (Hindi) by Paramahansa Yogananda. This book is published by Fingerprint! Publishing in Paperback format, ISBN 9789389432473, ASIN 9389432472, under Religion and Spirituality, Spirituality, Spiritual Self-Help.

Book Description

Inspiring stalwarts like the Beatles, Steve Jobs, and Ravi Shankar, autobiography of a Yogi is an immensely gratifying spiritual read that has altered and enriched the lives of millions across the world, since it was first published in 1946. An originative text that tells the story of Paramahansa Yogananda, this book has been revered for its memorable, incisive, and instructive teachings. This spiritual autobiography will take you on an incredible journey of Indian mysticism and spirituality and deliver humbling, comforting truths about life and existence. A book that deserves a place in every home...

Author Biography

Paramahansa Yogananda (1893-1952) was a pioneering guru and yogi. He founded the Self-Realization Fellowship in 1920 and the Yogoda Satsanga Society of India in 1917 which continue to carry on his spiritual legacy worldwide. Autobiography of a Yogi is one of his most popular books.

Editorial Reviews

Editorial Reviews will be added soon…

Book Summary

परमहंस योगानंद की पुस्तक Autobiography of a Yogi (हिंदी: योगी की आत्मकथा) आधुनिक आध्यात्मिक साहित्य की सबसे प्रसिद्ध आत्मकथाओं में से एक है। यह केवल लेखक के जीवन की घटनाओं का विवरण नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान, योग, गुरु-शिष्य परंपरा, ध्यान, ईश्वर-अनुभूति और मनुष्य की आध्यात्मिक संभावनाओं की खोज है। योगानंद अपने बचपन से लेकर भारत में अपनी आध्यात्मिक शिक्षा, अपने गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि के साथ संबंध, विभिन्न संतों और योगियों से मुलाकात तथा अंततः पश्चिम में योग और ध्यान के संदेश को पहुँचाने तक की यात्रा को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक का मूल प्रश्न यही है कि मनुष्य अपने बाहरी जीवन से आगे बढ़कर अपने भीतर छिपी चेतना को कैसे पहचान सकता है।

पुस्तक की शुरुआत योगानंद के बचपन और उनके आध्यात्मिक स्वभाव से होती है। उनका जन्म 1893 में गोरखपुर में मुकुंद लाल घोष के रूप में हुआ। बचपन से ही उनमें साधारण सांसारिक जीवन से आगे किसी गहरी वास्तविकता को जानने की तीव्र इच्छा दिखाई देती है। दूसरे बच्चों के लिए जिन चीजों का महत्व था, मुकुंद का मन अक्सर साधुओं, संतों, हिमालय और ईश्वर की खोज की ओर आकर्षित रहता था। वे आध्यात्मिक व्यक्तियों की कहानियाँ सुनकर प्रभावित होते और स्वयं भी किसी महान गुरु की खोज का स्वप्न देखते थे।

उनके जीवन में माता-पिता का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा। परिवार धार्मिक वातावरण से जुड़ा हुआ था, लेकिन योगानंद की आध्यात्मिक खोज केवल पारिवारिक संस्कारों तक सीमित नहीं रहती। उनके भीतर ईश्वर को प्रत्यक्ष अनुभव करने की इच्छा लगातार बढ़ती जाती है। वे केवल धार्मिक सिद्धांतों पर विश्वास करना नहीं चाहते; वे जानना चाहते हैं कि क्या ईश्वर का अनुभव वास्तव में किया जा सकता है।

युवावस्था में उनका मन कई बार घर छोड़कर हिमालय जाने की ओर होता है। वे साधुओं और आध्यात्मिक गुरुओं की खोज करते हैं। इस दौरान उनके जीवन में कई ऐसे प्रसंग आते हैं जिनमें उन्हें विभिन्न संतों और साधकों से मिलने का अवसर मिलता है। इन मुलाकातों से उन्हें यह समझ विकसित होती है कि आध्यात्मिक मार्ग केवल एक ही प्रकार का नहीं है। अलग-अलग साधक अलग-अलग तरीकों से सत्य की खोज करते हैं, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य आत्मिक जागरण हो सकता है।

योगानंद की जीवन-यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ उनके गुरु श्री युक्तेश्वर गिरि से मिलना है। लंबे समय से जिस गुरु की वे तलाश कर रहे थे, अंततः वे उनसे मिलते हैं। पहली मुलाकात ही उनके भीतर गहरा प्रभाव छोड़ती है। श्री युक्तेश्वर कठोर अनुशासन, स्पष्ट बुद्धि और आध्यात्मिक गहराई वाले गुरु के रूप में प्रस्तुत होते हैं। उनका प्रेम भावुकता पर आधारित नहीं है; वे अपने शिष्य से आत्मसंयम, विवेक और ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं।

गुरु-शिष्य संबंध इस आत्मकथा का केंद्रीय आधार बन जाता है। श्री युक्तेश्वर योगानंद को यह सिखाते हैं कि आध्यात्मिक जीवन केवल चमत्कार देखने या असाधारण अनुभव प्राप्त करने का नाम नहीं है। वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति के लिए मन, इच्छाओं और अहंकार पर नियंत्रण आवश्यक है। वे योगानंद को भीतर से बदलने की प्रक्रिया से गुजरने के लिए प्रेरित करते हैं।

योगानंद की शिक्षा में क्रिया योग विशेष महत्व रखता है। पुस्तक में क्रिया योग को ऐसी आध्यात्मिक साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो ध्यान और आत्म-अनुशासन के माध्यम से साधक को अपनी चेतना के गहरे स्तरों की ओर ले जाने में सहायता करती है। योगानंद के अनुसार मनुष्य की सामान्य चेतना बाहरी संसार और इंद्रियों में उलझी रहती है। ध्यान का उद्देश्य धीरे-धीरे ध्यान को भीतर की ओर मोड़ना है।

यहाँ पुस्तक का एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है—मनुष्य स्वयं को केवल शरीर और व्यक्तित्व तक सीमित समझता है, जबकि योग परंपरा उसके भीतर एक अधिक व्यापक चेतना की संभावना देखती है। योग का उद्देश्य इस गहरे आत्मिक स्वरूप का अनुभव करना है।

योगानंद की कथा में अनेक संतों और योगियों के प्रसंग आते हैं। वे ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके जीवन में असाधारण आध्यात्मिक क्षमताओं का वर्णन किया गया है। इनमें से कुछ घटनाएँ सामान्य भौतिक अनुभवों से अलग दिखाई देती हैं। पुस्तक में चमत्कार, दूरस्थ स्थानों पर उपस्थिति, असाधारण उपचार, ध्यान की शक्तियाँ और मृत्यु के प्रति अलग दृष्टिकोण जैसे विषयों का वर्णन मिलता है।

इन प्रसंगों का उद्देश्य केवल आश्चर्य पैदा करना नहीं है। योगानंद इन घटनाओं के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि मानव चेतना की संभावनाएँ हमारी सामान्य समझ से कहीं अधिक व्यापक हो सकती हैं। फिर भी पुस्तक का मूल जोर चमत्कारों पर नहीं, बल्कि उस चेतना पर है जिसमें ऐसी अनुभूतियाँ संभव मानी जाती हैं।

योगानंद के जीवन में माता आनंदमयी, लाहिड़ी महाशय, महावतार बाबाजी और अन्य आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के प्रसंग विशेष महत्व रखते हैं। लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग की आधुनिक परंपरा के प्रमुख गुरु के रूप में प्रस्तुत किया गया है। योगानंद के गुरु-परंपरा संबंधी वर्णन में लाहिड़ी महाशय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके माध्यम से गृहस्थ जीवन और योग-साधना के बीच एक पुल का विचार सामने आता है।

यह धारणा पुस्तक के लिए महत्वपूर्ण है कि आध्यात्मिक जीवन केवल संसार छोड़ देने वालों के लिए नहीं है। मनुष्य अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों के बीच रहते हुए भी ईश्वर की खोज कर सकता है। आध्यात्मिकता का अर्थ केवल बाहरी रूप बदलना नहीं, बल्कि चेतना और दृष्टिकोण का परिवर्तन है।

महावतार बाबाजी का वर्णन पुस्तक के सबसे रहस्यमय हिस्सों में से एक है। योगानंद उन्हें एक अत्यंत उच्च आध्यात्मिक सत्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो क्रिया योग की परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बाबाजी का चरित्र पुस्तक में गुरु-परंपरा की निरंतरता और योग के प्राचीन ज्ञान के आधुनिक युग तक पहुँचने का प्रतीक बन जाता है।

पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष विज्ञान और अध्यात्म के बीच संबंध है। योगानंद पश्चिमी शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिचित थे और वे आध्यात्मिक अनुभव को अंधविश्वास के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसे चेतना की व्यवस्थित खोज के रूप में समझाने का प्रयास करते हैं। उनके लिए योग केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि अभ्यास और अनुभव की एक पद्धति है।

हालाँकि आधुनिक पाठक पुस्तक में वर्णित कुछ अलौकिक घटनाओं को अलग-अलग दृष्टिकोण से देख सकते हैं। आत्मकथा का मूल्य केवल इन घटनाओं को ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में स्वीकार करने में नहीं है। इसकी व्यापक महत्ता उस आध्यात्मिक प्रश्न में है जो इनके पीछे मौजूद है—क्या मानव चेतना वास्तव में उतनी ही सीमित है जितनी हम सामान्य जीवन में मानते हैं?

योगानंद स्वयं भी शिक्षा को महत्व देते हैं। वे रांची में योगदा सत्संग विद्यालय की स्थापना करते हैं, जहाँ आधुनिक शिक्षा के साथ योग और आध्यात्मिक अनुशासन को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। उनके लिए शिक्षा केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा के संतुलित विकास में सहायता करना भी है।

बाद में उनका जीवन एक नए चरण में प्रवेश करता है जब वे अमेरिका जाते हैं। उनका उद्देश्य योग और ध्यान की शिक्षाओं को पश्चिमी समाज तक पहुँचाना होता है। उस समय भारत की आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति पश्चिम में व्यापक परिचय नहीं था। योगानंद व्याख्यानों, कक्षाओं और संस्थागत कार्यों के माध्यम से ध्यान और योग की शिक्षाओं को प्रस्तुत करते हैं।

यहाँ पुस्तक की एक बड़ी विशेषता दिखाई देती है। योगानंद पूर्व और पश्चिम के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करते हैं। वे भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक जीवन की भाषा में समझाने की कोशिश करते हैं। वे यह विचार सामने रखते हैं कि धर्मों के बाहरी रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन उनके भीतर ईश्वर की खोज और आत्मिक अनुभव की एक साझा धारा हो सकती है।

इस संदर्भ में धर्मों की एकता पुस्तक का महत्वपूर्ण विषय बन जाती है। योगानंद हिंदू योग परंपरा के साथ-साथ ईसाई आध्यात्मिक विचारों का भी सम्मानपूर्वक उल्लेख करते हैं। वे ईसा मसीह और योग परंपरा के बीच आध्यात्मिक समानताओं को खोजने का प्रयास करते हैं। उनके लिए सच्ची आध्यात्मिकता मनुष्य को विभाजित करने के बजाय भीतर से जोड़ती है।

पुस्तक में प्रेम और भक्ति को भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान मिलता है। योगानंद के अनुसार केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को अपने हृदय को भी विकसित करना पड़ता है। ईश्वर की खोज में श्रद्धा, प्रेम, विनम्रता और समर्पण की आवश्यकता होती है। गुरु के प्रति भक्ति भी इसी भाव का एक रूप है।

लेकिन योगानंद अंधी श्रद्धा के बजाय अनुभव पर बल देते हैं। उनका दृष्टिकोण यह है कि आध्यात्मिक सत्य को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करना चाहिए कि कोई परंपरा उसे कहती है। साधक को स्वयं अभ्यास करना चाहिए और अपनी चेतना में परिवर्तन को अनुभव करना चाहिए। इस अर्थ में पुस्तक पाठक को निष्क्रिय विश्वास के बजाय सक्रिय खोज की ओर प्रेरित करती है।

Autobiography of a Yogi में मृत्यु के प्रति दृष्टिकोण भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। योगानंद मृत्यु को केवल जीवन के अंत के रूप में नहीं देखते। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के अनुसार आत्मा शरीर से अलग एक गहरी वास्तविकता है। इसलिए मृत्यु को चेतना की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। यह दृष्टिकोण पाठक को जीवन की अस्थिरता और आत्मिक पहचान पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

पुस्तक का अंतिम प्रभाव इसी व्यापक विचार में निहित है कि मनुष्य अपने वर्तमान जीवन से कहीं अधिक गहरी आध्यात्मिक क्षमता रखता है। धन, प्रसिद्धि, शिक्षा और सामाजिक सफलता जीवन के उपयोगी हिस्से हो सकते हैं, लेकिन वे स्थायी संतोष की गारंटी नहीं देते। मनुष्य को अंततः अपने भीतर शांति और अर्थ की खोज करनी पड़ती है।

योगानंद की अपनी यात्रा इसी परिवर्तन का उदाहरण है। मुकुंद के रूप में शुरू होने वाला एक जिज्ञासु बालक धीरे-धीरे योगी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक बनता है। उनकी यात्रा सीधी और आसान नहीं है। इसमें उत्साह, अनुशासन, संघर्ष, गुरु की कठोर शिक्षा, आध्यात्मिक अनुभव और सेवा—सभी शामिल हैं।

इस आत्मकथा की सबसे मानवीय सीख यह है कि आध्यात्मिकता जीवन से भागना नहीं है। सच्ची साधना मनुष्य को अधिक सजग, प्रेमपूर्ण, अनुशासित और करुणामय बनाने की दिशा में ले जानी चाहिए। ध्यान का उद्देश्य केवल आँखें बंद करके किसी विशेष अनुभव की प्रतीक्षा करना नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को अधिक स्पष्टता से देखना भी है।

अंततः Autobiography of a Yogi एक ऐसे मनुष्य की यात्रा है जो बचपन से ही एक गहरे प्रश्न से प्रेरित था—क्या ईश्वर को वास्तव में जाना जा सकता है? योगानंद का उत्तर उनके पूरे जीवन में दिखाई देता है। वे कहते हैं कि आध्यात्मिक सत्य केवल पुस्तकों में पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि साधना और अनुभव का विषय है। गुरु, ध्यान, योग, भक्ति और आत्म-अनुशासन इस खोज के साधन बनते हैं।

पुस्तक पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि मनुष्य की पहचान केवल उसके शरीर, नौकरी, परिवार, उपलब्धियों और सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं हो सकती। उसके भीतर एक ऐसी चेतना की संभावना है जो अधिक शांत, व्यापक और प्रेमपूर्ण हो सकती है। इसी खोज को योगानंद अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा मानते हैं।

इस प्रकार योगी की आत्मकथा केवल एक महान योगी की जीवनी नहीं है। यह गुरु और शिष्य, विज्ञान और अध्यात्म, पूर्व और पश्चिम, व्यक्तिगत जीवन और सार्वभौमिक चेतना के बीच संवाद की पुस्तक है। इसका केंद्रीय संदेश सरल है—मनुष्य अपने भीतर की दुनिया को जानने का प्रयास करे, नियमित साधना और आत्मनिरीक्षण के माध्यम से चेतना को विकसित करे और जीवन को केवल बाहरी उपलब्धियों से न मापे। योगानंद की दृष्टि में मनुष्य का सबसे बड़ा साहस बाहरी संसार को जीतना नहीं, बल्कि स्वयं को जानना है। यही Autobiography of a Yogi की स्थायी आध्यात्मिक प्रेरणा है।

Sample Chapters

Sample Chapters will be added soon…
Indian Books
Indian Books
Catalog Manager