Ashtavakra Mahagita (Hindi)

MI Rajasve

Hardcover • 400 Pages • ₹ 349.00 • Hindi • 9789354407628
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Publisher Prakash
ISBN13 9789354407628
ASIN/SKU 9354407625
Book Format Hardcover
Language Hindi
Pages 400
List Price ₹ 349.00
Publishing Date 14/04/2023
Dimensions 19.2 x 12.6 x 2.8 cm
Weight 500 g
Book Code BD00070733

Discover Ashtavakra Mahagita (Hindi) by MI Rajasve. This book is published by Prakash in Hardcover format, ISBN 9789354407628, ASIN 9354407625, under Religion and Spirituality, Hindu Studies.

Book Description

King Janak prayed to Ashtavakra, a great sage of his time, to impart knowledge to him. The prayer was answered. All that King Janak asked, all the questions plaguing his mind, were given simple, clear, and compendious answers. This meaningful dialogue between sage and pupil is called the Ashtavakra Mahagita, a sacred text cherished by many and filled with boundless wisdom.
Other titles by M I Rajasve: Ashtavakra Mahagita, Dashrath Nandan-Dashanan Gatha, Chanakya Charitam Aur Akhand Rashtriya Ekta, Ashwatthama ki Amar Mani, Ashwatthama ka Abhishap.

The knowledge of the great sage Ashtavakra that will impart wisdom in readers of every age!

Embark on a journey to discover the self!
The dialogue between King Janak and the great sage, Ashtavakra that defined the ideas of identity, reality, and bondage.
The text that has inspired people for generations.
Non-dualist theory in its most radical form.
One of M I Rajasve’s best works that celebrates the sacred text.

Author Biography

Born on June 2, 1967, in Lank village, Shamli district, Uttar Pradesh, M. I. Rajasve started writing during his school life. His first story, "Pratishodh Ki Jwala," which was later titled "Aag Ka Dariya," was published in several magazines. M. I. Rajasve has done his master's in history. He has great interest in India’s past and its cultural and historical heritage. Around 70 of his 100 books are based on historical background, characters, and events. An earnest journalist, his writings involve philosophical analysis, deep thinking, and rational assessment. Rajasve has worked as an editor for the magazines Grihshobha, Shubh India, and Haryana Heritage and has also edited several prestigious publications in the country. He has been awarded the Pandey Bechan Sharma Ugra Award by the Uttar Pradesh Hindi Sansthan for the year 2017.

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Book Summary

अष्टावक्र महागीता एम. आई. राजस्वे की ऐसी पुस्तक है जो मनुष्य को उसके बाहरी जीवन से हटाकर उसके भीतर की उस गहराई की ओर ले जाने का प्रयास करती है, जहाँ शांति, स्वतंत्रता और आत्मबोध का अनुभव संभव माना जाता है। यह कृति अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुए प्रसिद्ध संवाद की दार्शनिक परंपरा पर आधारित है। इसका मूल केंद्र कोई धार्मिक कर्मकांड, बाहरी उपलब्धि या संसार से पलायन नहीं, बल्कि यह प्रश्न है कि “मैं वास्तव में कौन हूँ?” मनुष्य अपने शरीर, विचारों, भावनाओं, संबंधों और सामाजिक पहचान को ही अपना स्वरूप मानकर जीवन जीता है, जबकि अष्टावक्र की दृष्टि में इन सबके पीछे एक ऐसी चेतना है जो इन परिवर्तनों की साक्षी है। पुस्तक इसी साक्षी-चेतना को पहचानने की दिशा में पाठक को ले जाती है।

अष्टावक्र की शिक्षा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सीधी और निर्भीक भाषा है। सामान्य आध्यात्मिक मार्गों में साधक को धीरे-धीरे नियमों, साधनाओं, अनुशासन और धार्मिक प्रक्रियाओं के माध्यम से आगे बढ़ने की सलाह दी जाती है। अष्टावक्र का दृष्टिकोण इससे अलग दिखाई देता है। वे सीधे मूल समस्या पर प्रहार करते हैं—मनुष्य की गलत पहचान। यदि व्यक्ति स्वयं को शरीर और मन मानता रहेगा, तो सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान और भय उसे लगातार प्रभावित करते रहेंगे। लेकिन यदि वह यह देख सके कि शरीर और मन में परिवर्तन हो रहे हैं और वह इन परिवर्तनों को जानने वाला है, तो उसके भीतर एक अलग प्रकार की स्वतंत्रता का जन्म हो सकता है।

राजा जनक इस संवाद में केवल एक राजा नहीं हैं, बल्कि एक जिज्ञासु मनुष्य के प्रतीक हैं। उनके सामने संसार की सारी बाहरी सुविधाएँ मौजूद हैं, फिर भी उनके भीतर अंतिम सत्य को जानने की इच्छा है। यही बात पुस्तक को आज के पाठक के लिए भी प्रासंगिक बनाती है। आधुनिक मनुष्य के पास पहले की तुलना में अधिक सुविधाएँ, अधिक जानकारी और अधिक विकल्प हैं, लेकिन मानसिक बेचैनी भी कम नहीं हुई है। इसलिए जनक का प्रश्न आज भी हमारे भीतर उठ सकता है—यदि सारी बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, तो वह कौन-सी चीज है जो मेरे भीतर स्थायी है?

अष्टावक्र का उत्तर आत्मा या आत्मस्वरूप की ओर संकेत करता है। उनके अनुसार मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शुद्ध चेतना है। शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, बूढ़ा होता है और अंततः समाप्त हो जाता है। विचार लगातार बदलते रहते हैं। भावनाएँ भी स्थायी नहीं हैं। कभी प्रसन्नता होती है, कभी क्रोध, कभी प्रेम, कभी भय और कभी निराशा। लेकिन इन सभी अवस्थाओं के आने-जाने को कोई जान रहा है। अष्टावक्र इसी “जानने वाले” की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं।

यहाँ पुस्तक का एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है—साक्षीभाव। साक्षीभाव का अर्थ भावनाओं या विचारों को जबरदस्ती रोक देना नहीं है। इसका अर्थ है उन्हें देखकर यह समझना कि वे मेरे अनुभव का हिस्सा हैं, लेकिन मेरा पूरा अस्तित्व नहीं हैं। उदाहरण के लिए, यदि मन में क्रोध उत्पन्न होता है, तो सामान्यतः व्यक्ति कहता है, “मैं क्रोधित हूँ।” साक्षीभाव की दृष्टि इसे थोड़ा बदल देती है—“मेरे भीतर क्रोध की भावना उत्पन्न हो रही है और मैं उसे देख सकता हूँ।” इस छोटे से अंतर में ही एक गहरी दूरी पैदा होती है। व्यक्ति भावना से पूरी तरह जुड़ने के बजाय उसे देखने लगता है।

इसी प्रकार दुख के समय भी अष्टावक्र की दृष्टि व्यक्ति को अपने दुख के साथ पूरी तरह अपनी पहचान जोड़ने से सावधान करती है। दुख एक अनुभव है; वह स्थायी पहचान नहीं है। मनुष्य के भीतर विचारों और भावनाओं का संसार लगातार बदलता रहता है। यदि व्यक्ति हर बदलती अवस्था को अपना वास्तविक स्वरूप मान ले, तो उसका जीवन भी उसी उतार-चढ़ाव में बंधा रहेगा।

पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण विषय बंधन और मुक्ति है। अष्टावक्र के अनुसार बंधन केवल बाहरी परिस्थितियों से पैदा नहीं होता। वास्तविक बंधन हमारी धारणाओं और आसक्तियों से पैदा होता है। मनुष्य किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति या विचार को पकड़कर बैठ जाता है और मानता है कि उसके बिना वह अधूरा है। फिर उसी चीज को खोने का भय पैदा होता है। इच्छा पूरी होती है तो कुछ समय के लिए आनंद मिलता है; इच्छा पूरी नहीं होती तो निराशा आती है। इस तरह मन लगातार किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर रहता है।

अष्टावक्र का मार्ग इस निर्भरता को देखने का मार्ग है। वे यह नहीं कहते कि संसार में रहना गलत है। समस्या संसार में होने की नहीं, बल्कि संसार को अपनी अंतिम पहचान बना लेने की है। राजा जनक इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। वे राजा हैं, उनके पास राज्य और जिम्मेदारियाँ हैं, फिर भी आत्मज्ञान की खोज उनके लिए संभव है। इससे यह विचार निकलता है कि आध्यात्मिकता के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता भीतर की दृष्टि बदलने की है।

यह विचार आधुनिक जीवन में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आज व्यक्ति नौकरी, व्यवसाय, परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक लक्ष्यों के बीच जीवन बिताता है। अक्सर वह सोचता है कि जब सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, तब शांति मिलेगी। लेकिन समस्याएँ समाप्त होने की प्रतीक्षा करते-करते जीवन बीत सकता है। अष्टावक्र की शिक्षा इस धारणा को चुनौती देती है। शांति केवल परिस्थितियों के ठीक हो जाने का परिणाम नहीं हो सकती; वह व्यक्ति की अपनी चेतना से भी संबंधित है।

इच्छा भी पुस्तक के केंद्रीय विषयों में है। इच्छा स्वयं में जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब मनुष्य अपनी संपूर्ण प्रसन्नता को इच्छाओं की पूर्ति से जोड़ देता है, तब बेचैनी बढ़ती जाती है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी पैदा हो जाती है। मन लगातार भविष्य की ओर दौड़ता रहता है। अष्टावक्र का संदेश है कि व्यक्ति इस दौड़ को देखे और समझे कि भीतर की पूर्णता किसी बाहरी उपलब्धि पर पूरी तरह निर्भर नहीं है।

यहाँ “त्याग” की धारणा भी एक नए रूप में सामने आती है। त्याग का अर्थ केवल वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है। यदि कोई व्यक्ति बाहरी वस्तुएँ छोड़ देता है लेकिन भीतर लगातार उनके बारे में सोचता रहता है, तो वास्तविक वैराग्य कहाँ हुआ? अष्टावक्र के अनुसार अधिक गहरा त्याग उस मानसिक पकड़ का है जिसके कारण वस्तुएँ हमें नियंत्रित करती हैं। व्यक्ति संसार में रह सकता है, अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकता है, लेकिन भीतर से अत्यधिक आसक्ति से मुक्त हो सकता है।

पुस्तक मन की प्रकृति पर भी गंभीर ध्यान देती है। मन लगातार तुलना करता है—यह अच्छा है, वह बुरा है; यह चाहिए, वह नहीं चाहिए; मैं सफल हूँ, मैं असफल हूँ; लोग मुझे पसंद करते हैं या नहीं। इसी मूल्यांकन से अनेक मानसिक संघर्ष पैदा होते हैं। अष्टावक्र का दृष्टिकोण मन के साथ लड़ने के बजाय उसे देखने का है। विचारों को रोकने का प्रयास भी कभी-कभी एक नया संघर्ष बन सकता है। इसके बजाय व्यक्ति यह पहचान सकता है कि विचार आते हैं और चले जाते हैं, जबकि चेतना उन्हें देखती रहती है।

इसी संदर्भ में स्वीकार का भाव महत्वपूर्ण हो जाता है। स्वीकार का अर्थ निष्क्रिय हो जाना नहीं है। इसका अर्थ है वास्तविकता को पहले जैसा है वैसा देखना और उसके बाद आवश्यक कर्म करना। जब व्यक्ति किसी परिस्थिति को स्वीकार ही नहीं करता, तो उसकी ऊर्जा वास्तविक समस्या को समझने के बजाय उसके विरोध में खर्च होती रहती है। साक्षीभाव व्यक्ति को प्रतिक्रिया और उत्तर के बीच एक छोटी-सी जगह देता है। उसी जगह में विवेक जन्म ले सकता है।

अष्टावक्र की शिक्षा का एक और महत्वपूर्ण पहलू अहंकार है। अहंकार यहाँ केवल घमंड के अर्थ में नहीं है। इसका व्यापक अर्थ उस मानसिक पहचान से है जिसमें व्यक्ति अपने बारे में एक स्थायी कहानी बना लेता है—मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, मेरी सफलता यह है, मेरी असफलता यह है, मेरा सम्मान यह है, मेरी पहचान यह है। यह “मैं” लगातार अपने लिए कुछ जोड़ता रहता है। जब इस पहचान को चोट पहुँचती है, तो व्यक्ति परेशान होता है।

अष्टावक्र इस मानसिक “मैं” को अंतिम सत्य मानने से रोकते हैं। वे पूछते हैं कि यदि शरीर बदल गया, विचार बदल गए, भावनाएँ बदल गईं और जीवन की परिस्थितियाँ बदल गईं, तो वह कौन है जो इन सबको जानता है? यह प्रश्न पुस्तक के आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र बन जाता है।

आत्मज्ञान इसलिए किसी नई जानकारी को इकट्ठा करने का नाम नहीं है। व्यक्ति बहुत-सी आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ सकता है, अनेक सिद्धांत याद कर सकता है और फिर भी अपने वास्तविक स्वरूप को न पहचान पाए। आत्मज्ञान को यहाँ एक प्रत्यक्ष पहचान की तरह देखा जाता है—अपने भीतर उस चेतना को देखना जो पहले से मौजूद है। इस दृष्टि से ज्ञान भविष्य में प्राप्त होने वाली वस्तु कम और वर्तमान में पहचाने जाने वाला सत्य अधिक है।

पुस्तक में समता का भाव भी महत्वपूर्ण है। जब व्यक्ति अपने सुख को केवल अनुकूल परिस्थितियों से और दुख को केवल प्रतिकूल परिस्थितियों से जोड़ता है, तो उसका मन परिस्थितियों के साथ ऊपर-नीचे होता रहता है। साक्षीभाव धीरे-धीरे एक ऐसी आंतरिक स्थिरता की ओर संकेत करता है जहाँ सुख का अनुभव होने पर भी व्यक्ति उससे चिपकता नहीं और दुख आने पर भी स्वयं को केवल दुख तक सीमित नहीं कर देता।

इसका अर्थ भावनाओं से रहित जीवन नहीं है। आत्मबोध का अर्थ पत्थर जैसा हो जाना नहीं है। बल्कि इसके विपरीत, जब व्यक्ति अपनी मानसिक प्रतिक्रियाओं का गुलाम नहीं रहता, तब वह जीवन को अधिक स्पष्टता से अनुभव कर सकता है। प्रेम हो सकता है, करुणा हो सकती है, आनंद हो सकता है, लेकिन उनमें ऐसी पकड़ न हो जो भय और असुरक्षा को जन्म दे।

अष्टावक्र महागीता का सबसे गहरा संदेश शायद यही है कि मुक्ति किसी दूर के स्थान पर नहीं है। व्यक्ति जिस चेतना की तलाश कर रहा है, उसी चेतना में उसका वर्तमान अनुभव घटित हो रहा है। इसलिए खोज को बाहर से भीतर की ओर मोड़ना आवश्यक है। प्रश्न यह नहीं कि “मुझे क्या प्राप्त करना है?” बल्कि यह कि “मैं अभी स्वयं को किस रूप में देख रहा हूँ?”

राजा जनक और अष्टावक्र का संवाद इस आत्म-अन्वेषण को अत्यंत मानवीय बना देता है। जनक के प्रश्नों में वह बेचैनी है जिसे कोई भी गंभीर व्यक्ति महसूस कर सकता है। अष्टावक्र के उत्तर उस बेचैनी को किसी नई विचारधारा से भरने के बजाय उसकी जड़ की ओर ले जाते हैं। वे बार-बार पहचान, आसक्ति, इच्छा और मानसिक धारणाओं के पार देखने का संकेत देते हैं।

अंततः अष्टावक्र महागीता संसार को छोड़ने की पुस्तक से अधिक स्वयं की गलत पहचान छोड़ने की पुस्तक है। इसका उद्देश्य पाठक को जीवन से भागने के लिए प्रेरित करना नहीं, बल्कि जीवन को एक अलग दृष्टि से देखने के लिए आमंत्रित करना है। परिवार, काम, संबंध, सफलता, असफलता, सुख और दुख—ये सब जीवन के हिस्से हैं। लेकिन इनके बीच अपने वास्तविक स्वरूप को न भूलना ही इस दर्शन का सार है।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए सबसे मूल्यवान बात शायद कोई एक सिद्धांत याद कर लेना नहीं, बल्कि अपने भीतर प्रश्न उठाना है—“मैं कौन हूँ?” यदि यह प्रश्न केवल बौद्धिक जिज्ञासा न रहकर आत्म-अनुभव की खोज बन जाए, तो अष्टावक्र की शिक्षा का वास्तविक अर्थ खुलना शुरू होता है। तब धीरे-धीरे यह समझ विकसित हो सकती है कि शांति बाहर से जोड़ने वाली कोई वस्तु नहीं, बल्कि भीतर मौजूद उस चेतना की पहचान है जिसे विचारों, इच्छाओं और परिस्थितियों ने लंबे समय से ढक रखा है।

इसी कारण अष्टावक्र महागीता एक ऐसी आध्यात्मिक कृति के रूप में सामने आती है जो पाठक को उत्तरों से अधिक आत्मदृष्टि देती है। इसकी यात्रा बाहरी उपलब्धि से आंतरिक स्वतंत्रता की ओर, बेचैनी से साक्षीभाव की ओर और सीमित “मैं” से व्यापक चेतना की ओर जाती है। इसका संदेश सरल शब्दों में यही है—मनुष्य जिस पूर्णता को संसार में खोजता फिरता है, उसे पहचानने की शुरुआत अपने भीतर देखने से होती है।

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