Gita Press 2,88,600 Ram Naam Lekhan Pustika (Pack of 10 – 28,860 Ram Naam per Copy)| with Boxes

Gorakhpur Gita Press

Paperback • 64 Pages • ₹ 100.00 • Hindi • 9789347574658
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Publisher Gita Press, Gorakhpur
ISBN13 9789347574658
ASIN/SKU 9347574651
Book Format Paperback
Language Hindi
Pages 64
List Price ₹ 100.00
Publishing Date 07/08/2022
Dimensions 20 x 13.5 x 8 cm
Weight 610 g
Book Code BD00070731

Discover Gita Press 2,88,600 Ram Naam Lekhan Pustika (Pack of 10 – 28,860 Ram Naam per Copy)| with Boxes by Gorakhpur Gita Press. This book is published by Gita Press, Gorakhpur in Paperback format, ISBN 9789347574658, ASIN 9347574651, under Religion and Spirituality, Theology and Philosophy of Religion, History of Religion.

Book Description

Gita Press Ram Naam Lekhan Pustika – Bhagwan Naam Mahatmya (28,860 Ram Naam per Copy) | Pack of 10

Immerse yourself in the divine practice of likhit jaap with this authentic Gita Press, Gorakhpur edition of Bhagwan Naam Mahatmya. This sacred Ram Naam Copy pairs the timeless glory of the divine name with 28,860 clear, well-organised boxes per copy for writing "राम" — a pack of 10 copies offering 2,88,600 Ram Naam in all — a proven aid to devotion, concentration and inner peace.

Writing the holy name of Shri Ram (Ram Naam lekhan) is one of the simplest and most powerful spiritual sadhanas — open to everyone, in any language, at any time. The large, neat boxes make the practice easy for children, adults and the elderly, while the smooth, high-quality Gita Press paper ensures effortless, bleed-free writing. Its compact book-format (medium) size fits easily in your hands, puja shelf or travel bag.

Why devotees choose this Ram Naam Copy:
✓ Authentic Gita Press, Gorakhpur quality — the most trusted name in Sanatan Dharma publishing
✓ 28,860 clearly ruled boxes per copy for focused Ram Naam writing
✓ Pack of 10 = 2,88,600 Ram Naam — ideal for family, group sadhana and donation
✓ High-quality, bleed-free paper with crisp Devanagari print
✓ Compact medium (book-format) size — easy to hold, store and carry

This Pack of 10 is perfect for the whole family, group sadhana, gifting to fellow devotees, or donating to temples and a Shri Ram Naam Lekhan Bank. A cherished spiritual gift for Ram Navami, festivals, griha pravesh, or daily worship. Begin your journey of Ram Naam lekhan today — with the trusted quality of Gita Press.

गीता प्रेस राम नाम लेखन पुस्तिका – भगवान् नाम माहात्म्य (प्रत्येक कॉपी में 28,860 राम नाम) | 10 का सेट

गीता प्रेस, गोरखपुर का यह प्रामाणिक संस्करण भगवान् नाम माहात्म्य (आइटम कोड 2153) भगवन्नाम की महिमा के साथ प्रत्येक कॉपी में 28,860 राम नाम लिखने हेतु स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित खाने प्रदान करता है — 10 कॉपियों के सेट में कुल 2,88,600 राम नाम। राम नाम लेखन (लिखित जप) साधना, एकाग्रता एवं मन की शांति का सरल एवं अत्यंत प्रभावशाली साधन है।

बड़े एवं स्पष्ट खानों के कारण बच्चे, बड़े एवं वृद्धजन सभी सरलता से "राम" लिख सकते हैं। उच्च गुणवत्ता वाले कागज पर स्पष्ट देवनागरी छपाई — बिना स्याही फैले सुगम लेखन। पुस्तकाकार (मध्यम आकार) होने से रखने, पकड़ने एवं यात्रा में साथ ले जाने में सुविधाजनक।

यह 10 का सेट परिवार, सामूहिक साधना, भक्तों को भेंट देने अथवा मंदिर व श्री राम नाम लेखन बैंक में दान हेतु उत्तम है। राम नवमी, पर्व-त्योहार, गृह प्रवेश अथवा नित्य पूजा के लिए श्रेष्ठ आध्यात्मिक उपहार। गीता प्रेस की विश्वसनीय गुणवत्ता के साथ आज ही राम नाम लेखन आरंभ करें।

भगवान् नाम माहात्म्य • राम नाम कॉपी • Code 2153 • Pack of 10 • Hindi

Author Biography

Brief Introduction of Gita Press, Gorakhpur

Gita Press was established in pre‑independence India in Vikram Samvat 1980 (1923 CE). At that time, if we look at the social conditions, we find that for centuries the country had been under the rule of Mughal invaders and non‑Hindu rulers, whose sole aim was to destroy our culture and civilization, demolish our places of worship, break the idols of our deities, label our modes of worship as hypocrisy, insult our religious teachers, and burn our sacred scriptures.

A grave crisis was looming over Sanatana Dharma. Out of fear, Hindus hesitated to protest. Our scriptures had almost disappeared from public life, and even authentic images of our deities for worship were hardly available. In such circumstances there was a pressing need to propagate Sanatana Dharma. A notion had been created in people’s minds that anyone who reads the Gita becomes a renunciant, or that the Gita is meant only for ascetics. To dispel this misconception and to promote the Gita and other spiritual scriptures, Gita Press was founded.

At that time most commentaries on the Gita by traditional teachers were available only in Sanskrit, beyond the understanding of the ordinary educated reader. People wished to know the meaning of each word, with segmentation and grammatical connection, but there was no good commentary in Hindi. To fulfil this need, the revered founder of Gita Press, the late Brahmleen Shri Jayadayal Goyandka, prepared a universally useful Hindi commentary on the Gita,.

The main objective of Gita Press is to publish spiritual, moral, and character‑building books and magazines for the service of humanity, in order to promote love of God, truth, righteous conduct, and noble values. Its chief work is to spread elevating literature at the lowest possible prices. The prices of the books are generally kept below cost, yet the institution does not accept any kind of financial assistance or donations from anyone.

A powerful thought in the mind of the revered Shri Jayadayal Goyandka was how people could attain peace and happiness, and ultimately God‑realization, while remaining in the householder’s life. His constant concern was how human beings could cross this ocean of worldly existence. Many seekers believed that to realize God one must go into seclusion, to holy places or forests, and perform severe austerities there; and various misconceptions were prevalent that women, Shudras, Vaishyas, and householders could not attain spiritual welfare.

Main Work – Publication of Sacred Literature

Along with the Srimad Bhagavad Gita, Gita Press publishes the Ramayana, Puranas, Upanishads, lives of saints, daily recitation books, guides for spiritual practice and devotion, children’s textbooks, books for women and for general use, picture‑story books, and more. The discourses of Shri Jayadayal Goyandka (“Sethji”), Shri Hanuman Prasad Poddar (“Bhaiji”), and Swami Ramsukhdasji have also been published in book form. By the grace of the Lord, the number of publications is increasing day by day.

For the convenience and demand of non‑Hindi speakers, books are being published not only in Hindi and Sanskrit but also in English, Bengali, Gujarati, Marathi, Tamil, Telugu, Kannada, Odia, Assamese, Malayalam, Punjabi, Nepali, Urdu, and other languages. At present, Gita Press has more than about 1,800 different publications and has published over 1 billion books.

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Book Summary

2,88,600 राम नाम लेखन पुस्तिका’ गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित एक ऐसी धार्मिक साधना-पुस्तिका है जिसका मुख्य उद्देश्य पाठक को नियमित रूप से भगवान श्रीराम के नाम का स्मरण और लेखन करने के लिए प्रेरित करना है। यह सामान्य अर्थों में कोई कथा, उपन्यास या विचारप्रधान पुस्तक नहीं है, बल्कि एक नाम-स्मरण और नाम-लेखन की साधना-पुस्तिका है। इसका केंद्र भगवान के नाम की महिमा, नियमित आध्यात्मिक अभ्यास, मन की एकाग्रता और भक्ति-भाव को जीवन में स्थान देना है। पुस्तिका का स्वरूप अत्यंत सरल है, लेकिन इसके पीछे भारतीय भक्ति-परंपरा में नाम-स्मरण की बहुत गहरी आध्यात्मिक भावना निहित है।

इस पुस्तिका को समझने के लिए सबसे पहले ‘राम नाम’ की भारतीय धार्मिक परंपरा में स्थिति को समझना आवश्यक है। हिंदू भक्ति-परंपरा में भगवान का नाम केवल किसी व्यक्ति या देवता को संबोधित करने वाला शब्द नहीं माना जाता, बल्कि भक्त के लिए वह ईश्वर की स्मृति का माध्यम है। ‘राम’ नाम का उच्चारण, श्रवण, जप और लेखन मनुष्य को बार-बार अपने आराध्य की ओर लौटाने का साधन माना गया है। इसी भावना के आधार पर राम नाम लेखन की परंपरा विकसित हुई है। भक्त कागज पर बार-बार ‘राम’ लिखते हुए अपने मन को सांसारिक चिंताओं से हटाकर भगवान की ओर लगाने का प्रयास करता है।

‘2,88,600’ की संख्या पुस्तिका की साधना-पद्धति की विशेषता को दर्शाती है। इतनी बड़ी संख्या में राम नाम लिखने की व्यवस्था साधक को दीर्घकालीन अभ्यास की ओर ले जाती है। इसका उद्देश्य केवल एक दिन या कुछ दिनों तक धार्मिक भावना से प्रेरित होकर नाम लिखना नहीं, बल्कि नाम-स्मरण को एक नियमित अनुशासन में बदलना है। जब कोई व्यक्ति एक ही पवित्र नाम को बार-बार लिखता है, तो उसका हाथ, दृष्टि और मन एक ही आध्यात्मिक केंद्र से जुड़ने लगते हैं। इस प्रकार लेखन स्वयं एक प्रकार की साधना बन जाता है।

इस पुस्तिका की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी सरलता है। इसमें किसी कठिन दार्शनिक सिद्धांत को समझने या किसी जटिल धार्मिक विधि को सीखने की आवश्यकता नहीं होती। साधक को अपने आराध्य के नाम से जुड़ने के लिए केवल श्रद्धा, धैर्य और नियमितता की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि नाम-लेखन की साधना अलग-अलग आयु और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के लोगों के लिए सहज हो सकती है। कोई व्यक्ति लंबे समय तक ध्यान न कर पाए, फिर भी कुछ समय शांत होकर राम नाम लिख सकता है।

राम नाम लिखने की प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार की एकाग्रता विकसित हो सकती है। सामान्य जीवन में मन लगातार अलग-अलग विचारों, चिंताओं, इच्छाओं और योजनाओं के बीच घूमता रहता है। मनुष्य एक काम करते हुए दूसरे काम के बारे में सोचता है और वर्तमान क्षण में पूरी तरह उपस्थित नहीं रह पाता। नाम-लेखन इस बिखराव को कम करने का अभ्यास बन सकता है। जब साधक प्रत्येक पंक्ति में ‘राम’ लिखता है, तो उसकी दृष्टि शब्द पर रहती है, हाथ उसी शब्द को लिखता है और मन उसी नाम का स्मरण करता है। इस प्रकार शरीर, इंद्रिय और मन एक ही कार्य में लगाए जाते हैं।

इस साधना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष नियमितता है। आध्यात्मिक जीवन में केवल उत्साह पर्याप्त नहीं माना जाता। उत्साह कभी बहुत अधिक होता है और कभी कम हो जाता है। यदि साधना केवल भावनात्मक उत्साह पर निर्भर हो, तो वह लंबे समय तक चलना कठिन हो सकता है। नाम-लेखन की पुस्तिका साधक को एक निश्चित अभ्यास की ओर प्रेरित करती है। प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा लिखना, एक दिन बहुत अधिक करके फिर कई दिनों तक छोड़ देने की तुलना में अधिक स्थायी अभ्यास बन सकता है।

राम नाम लेखन का संबंध भारतीय संत परंपरा की उस धारणा से भी है जिसमें भगवान का नाम स्वयं साधना का सरल मार्ग माना गया है। भक्ति साहित्य में बार-बार यह विचार मिलता है कि वर्तमान जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी ईश्वर के नाम का स्मरण किया जा सकता है। इसके लिए जंगल, आश्रम या किसी विशेष स्थान पर जाना अनिवार्य नहीं है। व्यक्ति अपने घर में, पूजा के समय या अपने दैनिक जीवन में नाम-स्मरण कर सकता है।

इस दृष्टि से यह पुस्तिका धार्मिक जीवन को दैनिक जीवन से जोड़ती है। साधना को केवल मंदिर या विशेष धार्मिक अवसर तक सीमित रखने के बजाय नाम-लेखन के माध्यम से उसे व्यक्तिगत दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है। कुछ समय के लिए शांत बैठकर लिखना व्यक्ति के दिन में एक ऐसा अंतराल पैदा करता है जिसमें वह बाहरी गतिविधियों से हटकर अपने भीतर की ओर ध्यान कर सकता है।

राम नाम का आध्यात्मिक अर्थ केवल शब्द लिखने तक सीमित नहीं है। भक्त के लिए ‘राम’ नाम भगवान श्रीराम की स्मृति से जुड़ा है। श्रीराम भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में मर्यादा, सत्य, कर्तव्य, करुणा, धैर्य और आदर्श जीवन के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए राम नाम का स्मरण केवल एक मंत्र-जैसी पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि भगवान के चरित्र और आदर्शों को याद करने का अवसर भी बन सकता है। जब भक्त राम नाम लिखता है, तो उसके भीतर श्रीराम के प्रति श्रद्धा और उनके आदर्श जीवन को अपनाने की प्रेरणा भी जाग सकती है।

नाम-लेखन की एक विशेष मानवीय खूबी यह है कि इसमें व्यक्ति और उसके आराध्य के बीच निजी संबंध की भावना विकसित हो सकती है। कोई व्यक्ति दूसरों को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपने मन की शांति और भक्ति के लिए नाम लिखता है। इसलिए इस साधना का मूल्य केवल लिखे गए नामों की संख्या में नहीं है। संख्या अनुशासन और निरंतरता का प्रतीक हो सकती है, लेकिन साधना का भाव उससे अधिक महत्वपूर्ण है।

इस पुस्तिका का एक और पहलू मन की शुद्धि से जुड़ा है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ‘चित्तशुद्धि’ का अर्थ मन में जमा स्वार्थ, अहंकार, अस्थिरता और नकारात्मक प्रवृत्तियों को धीरे-धीरे कम करना है। नाम-स्मरण को इस प्रक्रिया का एक साधन माना गया है। नियमित रूप से भगवान का स्मरण करने वाला व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार पर अधिक ध्यान देना शुरू कर सकता है। हालांकि केवल नाम लिखना अपने आप में व्यक्ति के सभी मानसिक या नैतिक संघर्ष समाप्त नहीं कर देता, लेकिन यह आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक अनुशासन के लिए एक आधार प्रदान कर सकता है।

पुस्तिका का स्वरूप यह भी बताता है कि भक्ति केवल पढ़ने या सुनने की चीज नहीं है। हाथ से लिखना स्वयं एक सक्रिय भागीदारी है। जब साधक ‘राम’ शब्द को बार-बार अपने हाथ से लिखता है, तो वह केवल किसी पुस्तक का पाठक नहीं रहता; वह साधना की प्रक्रिया में स्वयं शामिल हो जाता है। लिखे गए प्रत्येक नाम के साथ उसका समय, ध्यान और श्रम जुड़ता है। इस कारण नाम-लेखन की साधना में व्यक्तिगत समर्पण की अनुभूति अधिक गहरी हो सकती है।

2,88,600 नामों का लक्ष्य साधक में धैर्य भी विकसित करता है। इतनी बड़ी संख्या को एक साथ पूरा करने की कोशिश व्यावहारिक नहीं होगी। इसलिए इसे धीरे-धीरे पूरा करना पड़ता है। यही प्रक्रिया जीवन के दूसरे क्षेत्रों के लिए भी एक सुंदर शिक्षा देती है कि बड़े लक्ष्य छोटे-छोटे नियमित प्रयासों से पूरे होते हैं। आध्यात्मिक साधना में भी निरंतरता अक्सर अचानक उत्पन्न होने वाले उत्साह से अधिक महत्वपूर्ण होती है।

यह पुस्तिका सामूहिक धार्मिक संस्कृति से भी जुड़ती है। गीता प्रेस, गोरखपुर लंबे समय से हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक साहित्य के प्रकाशन के लिए जाना जाता है। उसके प्रकाशनों में धार्मिक ग्रंथों, स्तोत्रों, पूजा-सामग्री और साधना-संबंधी पुस्तिकाओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। राम नाम लेखन पुस्तिका इसी व्यापक परंपरा में आती है, जहाँ धार्मिक साहित्य को केवल पढ़ने के लिए नहीं बल्कि व्यवहारिक साधना के लिए भी उपयोग किया जाता है।

राम नाम लिखने की साधना व्यक्ति को वर्तमान क्षण में रहने की आदत भी दे सकती है। यदि साधक जल्दबाजी के बजाय शांत मन से लिखे, तो प्रत्येक नाम एक छोटे ध्यान की तरह अनुभव किया जा सकता है। हाथ धीरे-धीरे चलता है, आँखें शब्द को देखती हैं और मन नाम पर लौटता है। इस प्रक्रिया में सांसारिक विचार आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन साधक बार-बार अपना ध्यान राम नाम की ओर वापस ला सकता है। यही बार-बार लौटना एकाग्रता का अभ्यास बन जाता है।

इस साधना का एक भावनात्मक पक्ष भी है। जीवन में चिंता, असफलता, पारिवारिक कठिनाइयाँ, अकेलापन और अनिश्चितता आती रहती हैं। धार्मिक आस्था रखने वाले व्यक्ति के लिए भगवान का नाम इन परिस्थितियों में आश्रय का अनुभव दे सकता है। राम नाम लिखते समय व्यक्ति अपनी चिंताओं को कुछ समय के लिए अलग रखकर ईश्वर के सामने स्वयं को समर्पित करने का अनुभव कर सकता है। यह अनुभव व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करता है, लेकिन भक्ति परंपरा में नाम-स्मरण को इसी प्रकार मानसिक और आध्यात्मिक सहारे के रूप में देखा गया है।

साथ ही, इस पुस्तिका का संदेश केवल व्यक्तिगत शांति तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि राम नाम का स्मरण वास्तव में व्यक्ति के जीवन में गहराई पैदा करता है, तो उसका प्रभाव उसके व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। श्रीराम के आदर्शों को याद करने का अर्थ सत्य, संयम, करुणा, कर्तव्य और दूसरों के प्रति सम्मान को जीवन में स्थान देना भी हो सकता है। इस दृष्टि से नाम-लेखन साधना का साधन है, अंतिम लक्ष्य नहीं।

पुस्तिका का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि यह आध्यात्मिकता को बहुत सरल क्रिया से जोड़ती है। किसी कठिन दार्शनिक बहस के बजाय एक नाम, एक कलम, एक पृष्ठ और कुछ शांत समय—इन साधारण साधनों के माध्यम से व्यक्ति अपने आराध्य से जुड़ने का प्रयास करता है। इस सरलता में ही इसकी व्यापक उपयोगिता निहित है।

अंततः ‘2,88,600 राम नाम लेखन पुस्तिका’ को एक नाम-जप आधारित आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में समझा जा सकता है। इसका केंद्र राम नाम का लेखन है, लेकिन इसके पीछे स्मरण, श्रद्धा, एकाग्रता, धैर्य, आत्मसंयम और भक्ति की व्यापक भावना है। 2,88,600 नामों का लक्ष्य साधक को लंबी अवधि तक अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है और धीरे-धीरे नाम-स्मरण को जीवन की नियमित आदत बनाने का अवसर देता है।

इस पुस्तिका की वास्तविक सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि कितनी बार ‘राम’ लिखा गया, बल्कि इस बात में है कि नाम लिखते समय मन में क्या भाव पैदा हुआ और उस साधना का प्रभाव जीवन पर कितना पड़ा। यदि नाम-लेखन मन को अधिक शांत, विनम्र, संयमी और करुणामय बनाता है, तो साधना अपने गहरे उद्देश्य की ओर बढ़ती है। इस प्रकार यह छोटी और सरल पुस्तिका भक्त को एक ऐसे मार्ग की ओर ले जाती है जिसमें हाथ से लिखा गया प्रत्येक ‘राम’ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि ईश्वर-स्मरण, आत्मचिंतन और भक्ति की ओर उठाया गया एक छोटा कदम बन सकता है।

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