Shrimad Bhagavad Gita Shankar Bhashya with Sanskrit Commentary and Hindi Translation

Gorakhpur Gita Press

Hardcover • 512 Pages • ₹ 200.00 • Hindi • 9789364482417
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Publisher Gita Press, Gorakhpur
ISBN13 9789364482417
ASIN/SKU B0BGX5ZGWX
Book Format Hardcover
Language Hindi
Pages 512
List Price ₹ 200.00
Publishing Date 06/07/2022
Dimensions 27 x 18.5 x 3 cm
Weight 870 g
Book Code BD00070728

Discover Shrimad Bhagavad Gita Shankar Bhashya with Sanskrit Commentary and Hindi Translation by Gorakhpur Gita Press. This book is published by Gita Press, Gorakhpur in Hardcover format, ISBN 9789364482417, ASIN B0BGX5ZGWX, under Religion and Spirituality, Hinduism, History of Religion.

Book Description

Shrimad Bhagavad Gita in Hindi — Lord Krishna's 700-verse dialogue with Arjuna on the battlefield of Kurukshetra, now fully accessible to Hindi-speaking devotees across India and the global diaspora in their own language with Sanskrit original and authoritative Hindi commentary.

The Bhagavad Gita was spoken by Lord Krishna to his disciple Arjuna on the battlefield of Kurukshetra approximately 5,000 years ago, on the eve of the Mahabharata War. Set within the Bhishma Parva of the Mahabharata, these 700 shlokas across 18 chapters address five eternal philosophical questions: the nature of Ishwara (God), the individual Jiva (soul), Prakriti (matter), Karma (righteous action), and Moksha (liberation). The three great paths it lays out — Karma Yoga (Chapters 3–6), Bhakti Yoga (Chapters 7–12), and Jnana Yoga (Chapters 13–18) — are not competing routes but a single ascending path that every sincere seeker must traverse. Mahatma Gandhi called it his 'eternal mother'; Robert Oppenheimer quoted it at the first nuclear test; it is studied in the philosophy departments of Oxford, Harvard, and every major Indian university. An estimated 700 million Hindus consider its recitation a daily spiritual duty.

For Hindi-speaking devotees across India and the global diaspora, this authoritative Hindi edition provides complete access to the Gita's 18 chapters and 700 shlokas with the clarity and fidelity they deserve. The translation maintains rigorous faithfulness to the Sanskrit original — the three primary paths of Karma Yoga (Chapters 3–6), Bhakti Yoga (Chapters 7–12), and Jnana Yoga (Chapters 13–18) are presented with their full philosophical integrity intact, not smoothed into popular self-help language. The Gita's unique contribution — that a householder engaged in the world can achieve liberation without renouncing family or profession, simply by transforming the quality of engagement — is the central thread through the entire commentary.

Complete 18 chapters, 700 shlokas in Sanskrit with Hindi translation
Three paths of yoga — Karma, Bhakti, Jnana — explained in Hindi cultural context
Format: Granthakaar/Large Edition
Ideal for: Hindi households establishing daily Gita practice, Ram Navami (April), Janmashtami (August), Navratri (October), Diwali (November), Gita Jayanti (December) gifting, satsang study groups
इस संस्करण के विषय में

गीता प्रेस, गोरखपुर प्रकाशित यह हिन्दी संस्करण भारत के प्रत्येक हिन्दी-भाषी परिवार के लिये उपयोगी है। मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिन्दी अनुवाद — नित्य पाठ, सत्संग और पर्वों पर उपहार के लिये आदर्श।

Author Biography

Gita Press, Gorakhpur, established in 1923 under Gobind Bhawan Karyalaya, is one of the world's largest publishers of Hindu religious literature. For over a century it has published the Ramcharitmanas, the Bhagavad Gita, the Puranas, the Upanishads and thousands of devotional works in Hindi, Sanskrit and India's regional languages, guided by a not-for-profit mission to bring sacred texts into every home at the most affordable price. Its editions are valued for their textual accuracy, clear typesetting and durable, economical production.

Editorial Reviews

About this edition: A faithful Gita Press, Gorakhpur edition of Shrimad Bhagavad Gita Shankar Bhashya with Sanskrit Commentary and Hindi Translation. It presents Lord Krishna's 700-verse discourse to Arjuna on duty, devotion and the path to liberation. Set in Hindi with the clear, accurate typesetting Gita Press is known for, printed on durable paper and produced for daily study and worship.

Book Summary

श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य भगवद्गीता को अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से समझने का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। गीता स्वयं जीवन, धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मा और परम सत्य जैसे प्रश्नों पर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुए संवाद का रूप है, जबकि आदि शंकराचार्य का शांकरभाष्य इस संवाद के दार्शनिक अर्थ को गहराई से स्पष्ट करता है। गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित यह संस्करण संस्कृत मूल पाठ, शांकरभाष्य और हिन्दी व्याख्या के माध्यम से पाठक को गीता के उस स्वरूप तक ले जाने का प्रयास करता है जिसमें मनुष्य का अंतिम लक्ष्य केवल संसार में सफलता या सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को पहचानना है।

गीता की शुरुआत कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र से होती है। अर्जुन अपने सामने अपने ही संबंधियों, गुरुओं और प्रियजनों को देखकर गहरे विषाद में पड़ जाते हैं। उनके हाथ से गांडीव छूटने लगता है और वे युद्ध करने से पीछे हटना चाहते हैं। उनका संकट केवल युद्ध का संकट नहीं है; यह मनुष्य के उस सार्वभौमिक संकट का प्रतीक है जिसमें कर्तव्य, भावनाएँ, नैतिकता और व्यक्तिगत मोह आपस में टकराने लगते हैं। अर्जुन का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पूछते हैं कि जब अपने ही लोगों को मारना पड़े तो विजय, राज्य और सुख का क्या मूल्य है?

शंकराचार्य के अनुसार गीता का उपदेश इसी भ्रम को दूर करने के लिए है। मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर, संबंधों और कर्मों के साथ अपनी पहचान जोड़ लेता है। इसी अज्ञान से मोह उत्पन्न होता है और मोह से कर्मबंधन। इसलिए गीता का मूल प्रयोजन आत्मज्ञान की ओर मनुष्य को ले जाना है। शांकरभाष्य में यह बात बार-बार सामने आती है कि परम सत्य को जानना ही अंतिम मुक्ति का मार्ग है।

दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा और शरीर के बीच का अंतर समझाते हैं। शरीर परिवर्तनशील है, जन्म लेता है और नष्ट होता है, लेकिन आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। इस दृष्टि से मृत्यु आत्मा का विनाश नहीं है। यह शिक्षा अर्जुन के शोक की जड़ पर प्रहार करती है। शंकराचार्य यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि शोक और मोह मूलतः अविद्या से उत्पन्न होते हैं। जब मनुष्य स्वयं को शरीर मानता है, तभी जन्म, मृत्यु, लाभ, हानि, सुख और दुःख को अंतिम सत्य समझता है।

इसी अध्याय में कर्मयोग की भूमिका भी सामने आती है। मनुष्य को अपने कर्तव्य से भागना नहीं चाहिए, लेकिन कर्म करते हुए उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। कर्म का उद्देश्य केवल बाहरी उपलब्धि नहीं होना चाहिए। निष्काम कर्म मन को शुद्ध करता है और धीरे-धीरे उसे आत्मज्ञान के योग्य बनाता है। शांकरभाष्य की दृष्टि से कर्म स्वयं अंतिम मुक्ति का कारण नहीं है; कर्म मन की शुद्धि में सहायक है, जबकि आत्मज्ञान अज्ञान को समाप्त करके मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन बनता है।

तीसरे अध्याय में कर्मयोग का विस्तार होता है। अर्जुन के मन में प्रश्न उठता है कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो कर्म क्यों किया जाए? श्रीकृष्ण समझाते हैं कि केवल कर्म छोड़ देने से मनुष्य निष्कर्म नहीं हो जाता। प्रकृति के गुण मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने निर्धारित कर्तव्य को आसक्ति रहित होकर करे। शंकराचार्य इस शिक्षा को विशेष रूप से उस साधक की दृष्टि से देखते हैं जो अभी आत्मज्ञान के लिए पूर्णतः तैयार नहीं हुआ है। ऐसे व्यक्ति के लिए निष्काम कर्म मन को धीरे-धीरे शांत और निर्मल करता है।

चौथे अध्याय में ज्ञान और कर्म के संबंध को और स्पष्ट किया जाता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग कोई नया सिद्धांत नहीं है, बल्कि प्राचीन परंपरा से चला आया ज्ञान है। जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब भगवान अवतार लेते हैं—यह प्रसिद्ध शिक्षा इसी अध्याय में आती है। शंकराचार्य इस प्रसंग की व्याख्या करते हुए भगवान के अवतार को सामान्य जीव के जन्म से अलग मानते हैं। भगवान का जन्म कर्मबंधन के कारण नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र सत्ता से होता है।

इसी अध्याय में कर्म, अकर्म और विकर्म की सूक्ष्म समस्या सामने आती है। केवल बाहर से कर्म करना या न करना पर्याप्त नहीं है; कर्म के पीछे की दृष्टि और ज्ञान महत्वपूर्ण हैं। जिस व्यक्ति की बुद्धि ज्ञान से प्रकाशित हो जाती है, उसके कर्म भी बंधनकारी नहीं रहते। अंततः ज्ञान उस अग्नि के समान है जो कर्मजनित अज्ञान और बंधन को जला देता है।

पाँचवाँ अध्याय संन्यास और कर्मयोग के संबंध पर केंद्रित है। अर्जुन जानना चाहते हैं कि कर्मसंन्यास श्रेष्ठ है या कर्मयोग। श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है, लेकिन निष्काम कर्मयोग साधक को संन्यास की ओर ले जाने वाला सहज मार्ग हो सकता है। शंकराचार्य के अनुसार वास्तविक संन्यास केवल बाहरी कर्मों का त्याग नहीं है; उसका गहरा अर्थ आत्मा और अनात्मा के विवेक के द्वारा संसार के प्रति आसक्ति का त्याग है।

छठे अध्याय में ध्यानयोग का वर्णन मिलता है। मनुष्य के लिए उसका अपना मन मित्र भी हो सकता है और शत्रु भी। अनुशासित मन साधक को आत्मज्ञान की ओर ले जाता है, जबकि असंयमित मन उसे विषयों और इच्छाओं में उलझाए रखता है। ध्यान के लिए शरीर, आसन, आहार और मन की उपयुक्त स्थिति का वर्णन किया गया है। मन को बार-बार विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करने की शिक्षा दी जाती है। यह अध्याय साधना के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाता है और बताता है कि आध्यात्मिक जीवन केवल बौद्धिक विचार नहीं, बल्कि मन के अनुशासन की भी मांग करता है।

सातवें से बारहवें अध्याय तक भगवान के स्वरूप, ब्रह्म, माया, भक्ति और विश्वव्यापी ईश्वर-सत्ता का विस्तार मिलता है। सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी प्रकृति के स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों की चर्चा करते हैं। संसार में दिखाई देने वाली विविधता के पीछे एक ही परम सत्ता है। मनुष्य की इच्छाएँ और आसक्तियाँ उसे उस सत्य से दूर रखती हैं।

आठवें अध्याय में ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ जैसे विषयों का विवेचन होता है। मृत्यु के समय जिस भाव का स्मरण किया जाता है, उसका महत्व बताया गया है। लेकिन शांकरभाष्य की व्यापक दृष्टि में अंतिम साध्य केवल मृत्यु के समय किसी विशेष विचार को पकड़ लेना नहीं, बल्कि जीवन में ही आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना है।

नौवाँ अध्याय गीता के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्यायों में से है। इसे राजविद्या और राजगुह्य कहा गया है। भगवान अपने व्यापक स्वरूप को बताते हुए स्पष्ट करते हैं कि वे समस्त जगत के आधार हैं, फिर भी किसी सीमित वस्तु से बंधे हुए नहीं हैं। भक्ति का सरल मार्ग भी यहाँ सामने आता है। भगवान के प्रति श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से साधक अपने मन को उच्चतर सत्य की ओर मोड़ सकता है।

दसवें अध्याय में भगवान अपनी विभूतियों का वर्णन करते हैं। संसार में जो कुछ श्रेष्ठ, तेजस्वी, शक्तिशाली या महान दिखाई देता है, उसे भगवान की विभूति के रूप में देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल चमत्कारों की सूची देना नहीं, बल्कि साधक की दृष्टि को बदलना है। जब मनुष्य संसार की श्रेष्ठ वस्तुओं में परम सत्ता की झलक देखना सीखता है, तब उसका दृष्टिकोण अधिक व्यापक हो जाता है।

ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन भगवान का विराट रूप देखते हैं। यह अनुभव उनके लिए अत्यंत विस्मयकारी और भयावह भी है। उन्हें दिखाई देता है कि समस्त योद्धा उस विराट सत्ता में प्रवेश कर रहे हैं। शंकराचार्य की व्याख्या में यह प्रसंग संसार की सीमित व्यक्तिगत दृष्टि से ऊपर उठकर ईश्वर की व्यापक सत्ता को देखने का प्रतीक है। अर्जुन समझते हैं कि व्यक्तिगत अहंकार से किया गया कर्तापन अंतिम सत्य नहीं है।

बारहवाँ अध्याय भक्ति और उपासना का सरल एवं हृदयस्पर्शी विवेचन करता है। सगुण रूप में भगवान की उपासना करने वाला भक्त भी आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। साथ ही उन साधकों का भी वर्णन है जो अव्यक्त ब्रह्म का ध्यान करते हैं। अंत में ऐसे भक्त के गुण बताए जाते हैं जो द्वेषरहित, करुणामय, अहंकाररहित, संतुष्ट, संयमी और समभाव रखने वाला है। इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन के स्वभाव में परिवर्तन भी है।

तेरहवें अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेचन है। शरीर को क्षेत्र और उसे जानने वाले को क्षेत्रज्ञ कहा गया है। मनुष्य को यह समझना है कि शरीर, मन और इंद्रियाँ उसके अनुभव का क्षेत्र हैं, लेकिन आत्मा इनसे भिन्न है। यही विवेक अद्वैत वेदान्त की केंद्रीय शिक्षा से जुड़ता है। चौदहवें अध्याय में सत्त्व, रजस् और तमस्—तीन गुणों का वर्णन किया गया है। ये गुण प्रकृति के कार्यों और मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। साधक का लक्ष्य केवल सत्त्वगुणी बनना नहीं, बल्कि अंततः तीनों गुणों से परे अपने आत्मस्वरूप को जानना है।

पंद्रहवें अध्याय में संसार की तुलना उल्टे अश्वत्थ वृक्ष से की गई है। उसकी जड़ ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं। यह संसार निरंतर परिवर्तनशील है और इसकी आसक्तियाँ मनुष्य को बांधे रखती हैं। वैराग्य और ज्ञान के द्वारा इस बंधन से ऊपर उठकर परम पुरुष की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।

सोलहवें और सत्रहवें अध्यायों में दैवी और आसुरी संपदाओं, श्रद्धा के विभिन्न रूपों तथा आहार, यज्ञ, तप और दान के तीन प्रकारों का विवेचन है। मनुष्य का चरित्र उसकी आध्यात्मिक यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अहंकार, क्रोध, लोभ और हिंसक प्रवृत्तियाँ बंधन की ओर ले जाती हैं, जबकि निर्भयता, सत्य, संयम, करुणा और आत्मनियंत्रण साधना को सहारा देते हैं।

अठारहवाँ अध्याय पूरी गीता का व्यापक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। यहाँ संन्यास, त्याग, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख को तीन गुणों के आधार पर समझाया जाता है। अंततः श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने स्वधर्म का पालन करने और परम सत्ता की शरण लेने की शिक्षा देते हैं। शांकरभाष्य की दृष्टि से गीता का अंतिम संदेश आत्मज्ञान की ओर जाता है—मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को ब्रह्म से अभिन्न समझे और अज्ञान से उत्पन्न आत्म-भ्रम से मुक्त हो।

इस पूरे ग्रंथ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि शंकराचार्य गीता को केवल धार्मिक आचरण की पुस्तक के रूप में नहीं देखते। उनके लिए गीता मनुष्य की मूल समस्या—अविद्या—का समाधान प्रस्तुत करती है। जब तक व्यक्ति स्वयं को शरीर, मन, इंद्रियों और अहंकार से जोड़कर देखता है, तब तक संसार के सुख-दुःख उसे बांधते रहते हैं। आत्मज्ञान इस गलत पहचान को दूर करता है। ज्ञान प्राप्त होने पर मनुष्य जानता है कि उसका वास्तविक स्वरूप नश्वर शरीर नहीं, बल्कि वह आत्मतत्त्व है जो परिवर्तन से परे है।

इस दृष्टि से श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य केवल दार्शनिक अध्ययन के लिए उपयोगी ग्रंथ नहीं है; यह आत्मचिंतन का भी निमंत्रण है। अर्जुन का संकट आज के मनुष्य के संकट से बहुत अलग नहीं है। आज भी व्यक्ति कर्तव्य और इच्छा, सफलता और शांति, संबंध और स्वतंत्रता, बाहरी उपलब्धि और भीतर की संतुष्टि के बीच उलझा रहता है। शांकराचार्य की व्याख्या उसे यह देखने के लिए प्रेरित करती है कि समस्या केवल बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि उस अज्ञान में भी है जिसके कारण हम स्वयं को गलत रूप में पहचानते हैं।

गीता प्रेस का संस्कृत पाठ, शांकरभाष्य और हिन्दी प्रस्तुतीकरण इस गहन दर्शन को हिन्दी पाठक के लिए सुलभ बनाने में सहायक है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो भगवद्गीता को केवल प्रेरणादायक श्लोकों के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित दार्शनिक ग्रंथ के रूप में समझना चाहते हैं। इसमें कर्म से आरंभ होकर मन की शुद्धि, वैराग्य, ध्यान, भक्ति और अंततः आत्मज्ञान तक की यात्रा दिखाई देती है।

अंततः श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य का केंद्रीय संदेश यह है कि मनुष्य की सबसे बड़ी मुक्ति बाहरी परिस्थितियों को बदलने में नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने में है। कर्म जीवन का आवश्यक अंग हो सकता है, भक्ति हृदय को शुद्ध कर सकती है, ध्यान मन को स्थिर कर सकता है, लेकिन अद्वैत वेदान्त की दृष्टि में अंतिम बंधन का नाश आत्मज्ञान से होता है। जब अज्ञान समाप्त होता है, तब आत्मा को उस रूप में जाना जाता है जो सदैव स्वतंत्र है। यही वह बिंदु है जहाँ अर्जुन का व्यक्तिगत संकट एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक प्रश्न में बदल जाता है—“मैं वास्तव में कौन हूँ?” और शांकरभाष्य उसी प्रश्न के उत्तर में गीता के संदेश को आत्मस्वरूप की पहचान और मोक्ष की दिशा में व्याख्यायित करता है।

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