Gita Sadhak Sanjivani

Swami Ramsukhdas Ji, Gorakhpur Gita Press

Hardcover • 1296 Pages • ₹ 400.00 • Hindi • 9789364483124
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Publisher Gita Press, Gorakhpur
ISBN13 9789364483124
ASIN/SKU B01GVF6KE2
Book Format Hardcover
Language Hindi
Pages 1296
List Price ₹ 400.00
Publishing Date 01/01/2013
Dimensions 27 x 18.5 x 6 cm
Weight 2 kg 200 g
Book Code BD00070722

Discover Gita Sadhak Sanjivani by Swami Ramsukhdas Ji. This book is published by Gita Press, Gorakhpur in Hardcover format, ISBN 9789364483124, ASIN B01GVF6KE2, under Religion and Spirituality, Hindu Studies, History of Religion.

Book Description

Sadhak Sanjivani — the definitive study commentary on the Bhagavad Gita by Swami Ramsukhdas: the most complete and practically-oriented Gita commentary ever written in Hindi, designed for the sincere seeker who wants not just to understand the Gita but to live by it.

Over 13 lakh copies across 130 editions — India's proven choice for this devotional text, in continuous print over 50 years. Over 13 lakh copies means this edition has been placed on study desks before examinations, presented at thread ceremonies and weddings, carried to Gita Jayanti recitation programmes, and kept on home-temple shelves as the family's daily devotional anchor — chosen, in each case, by a devotee who had alternatives and selected this Gita Press edition. 130 continuous editions mean Gita Press has reprinted this book without interruption because the sustained demand — from practitioners who return to it and recommend it — has required it. This is not a newly published text making promises: it is an established devotional companion with a documented print history that speaks for itself. What over 13 lakh readers have already discovered, you can discover today.

The Bhagavad Gita was spoken by Lord Krishna to his disciple Arjuna on the battlefield of Kurukshetra approximately 5,000 years ago, on the eve of the Mahabharata War. Set within the Bhishma Parva of the Mahabharata, these 700 shlokas across 18 chapters address five eternal philosophical questions: the nature of Ishwara (God), the individual Jiva (soul), Prakriti (matter), Karma (righteous action), and Moksha (liberation). The three great paths it lays out — Karma Yoga (Chapters 3–6), Bhakti Yoga (Chapters 7–12), and Jnana Yoga (Chapters 13–18) — are not competing routes but a single ascending path that every sincere seeker must traverse. Mahatma Gandhi called it his 'eternal mother'; Robert Oppenheimer quoted it at the first nuclear test; it is studied in the philosophy departments of Oxford, Harvard, and every major Indian university. An estimated 700 million Hindus consider its recitation a daily spiritual duty.

Swami Ramsukhdas spent his entire adult life in the study and teaching of the Bhagavad Gita. The Sadhak Sanjivani — whose name means "Elixir for Seekers" — is his magnum opus: a verse-by-verse commentary in which every shloka is first analysed word by word in the original Sanskrit, then given a faithful Hindi translation, and then opened out through a practical commentary that answers the question no other Gita commentary asks with this consistency: how does a person actually implement this teaching in daily life? The result spans over 1,500 pages across two volumes and contains insights into every dimension of dharmic living — family relationships, professional ethics, devotional practice, and the relationship between action, detachment, and liberation.

Complete 18 chapters, 700 shlokas — nothing abridged or summarised
Word-by-word Sanskrit analysis — Padacchheda and Anvaya for every shloka
Three paths in full depth: Karma Yoga (Chapters 3–6), Bhakti Yoga (Chapters 7–12), Jnana Yoga (Chapters 13–18)
Practical application focus: every commentary note explains real-life implementation, not just theoretical meaning
Format: Granthakaar/Large Edition — the preferred format for extended daily Gita study
Ideal for: serious daily study, pravachan preparation, Hindi households committed to understanding the Gita's practical guidance
Swami Ramsukhdas's key discovery: the Gita is not addressed to renunciates seeking to escape the world — it is Krishna's practical teaching for the householder navigating the world with integrity. Every commentary note answers the question: 'How do I live by this verse today?'

Author Biography

Author Biography will be added soon…

Editorial Reviews

About this edition: A faithful Gita Press, Gorakhpur edition of Gita Sadhak Sanjivani. It presents Lord Krishna's 700-verse discourse to Arjuna on duty, devotion and the path to liberation. Set in Hindi with the clear, accurate typesetting Gita Press is known for, printed on durable paper and produced for daily study and worship.

Book Summary

‘गीता साधक संजीवनी’ स्वामी रामसुखदास जी द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखी गई एक अत्यंत गहन, सरल और साधक-केंद्रित व्याख्या है। यह पुस्तक केवल गीता के श्लोकों का अर्थ समझाने का प्रयास नहीं करती, बल्कि पाठक को यह समझाने की कोशिश करती है कि गीता को अपने जीवन में कैसे उतारा जाए। स्वामी रामसुखदास जी की विशेषता यह है कि वे कठिन आध्यात्मिक विचारों को अत्यंत सहज भाषा में रखते हैं। उनके लिए गीता केवल पढ़ने या चर्चा करने का ग्रंथ नहीं है; वह जीवन को देखने की दृष्टि है और मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप, कर्तव्य, भक्ति, कर्म और परमात्मा के साथ अपने संबंध को समझने का मार्ग देती है।

‘साधक संजीवनी’ नाम ही इस ग्रंथ की प्रकृति को स्पष्ट करता है। संजीवनी अर्थात वह जो जीवन में नई चेतना भर दे, और साधक अर्थात वह व्यक्ति जो अपने जीवन को ईश्वर की ओर मोड़ना चाहता है। स्वामी रामसुखदास जी का उद्देश्य केवल विद्वानों को गीता समझाना नहीं, बल्कि सामान्य गृहस्थ, कर्मयोगी, भक्त और आध्यात्मिक जिज्ञासु—हर उस व्यक्ति तक गीता का संदेश पहुँचाना है जो अपने जीवन में शांति और आत्मिक परिवर्तन चाहता है। उनकी व्याख्या में दर्शन है, लेकिन दर्शन के साथ जीवन का व्यावहारिक पक्ष भी लगातार उपस्थित रहता है।

गीता का आरंभ अर्जुन के विषाद से होता है। युद्धभूमि में अर्जुन अपने सामने खड़े संबंधियों, गुरुओं और प्रियजनों को देखकर विचलित हो जाते हैं। उनका मन कर्तव्य और मोह के बीच फँस जाता है। स्वामी रामसुखदास जी की व्याख्या में अर्जुन का यह संकट केवल महाभारत के युद्ध की परिस्थिति नहीं रह जाता। यह हर मनुष्य की उस स्थिति का प्रतीक बन जाता है जब जीवन में सही और गलत, कर्तव्य और मोह, इच्छा और विवेक के बीच संघर्ष पैदा होता है। मनुष्य जानता है कि उसे क्या करना चाहिए, फिर भी उसका मन उससे पीछे हटता है। इस अर्थ में अर्जुन का विषाद आधुनिक मनुष्य का भी विषाद है।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सबसे पहले उनके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाते हैं। शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा नित्य है। जन्म और मृत्यु शरीर से संबंधित हैं; आत्मा को नष्ट नहीं किया जा सकता। स्वामी रामसुखदास जी इस सत्य को केवल दार्शनिक सिद्धांत के रूप में नहीं रखते, बल्कि इसे जीवन के भय और मोह को समझने की कुंजी बनाते हैं। जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, तब सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान और जन्म-मरण की घटनाएँ उसे अत्यधिक प्रभावित करती हैं। लेकिन जब वह अपने भीतर स्थित आत्मतत्त्व की ओर देखता है, तब उसकी दृष्टि धीरे-धीरे स्थिर होने लगती है।

गीता का एक महत्वपूर्ण संदेश कर्तव्य का पालन है। स्वामी रामसुखदास जी बताते हैं कि मनुष्य को अपने अधिकार से अधिक अपने कर्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। कर्म से बचना समाधान नहीं है। जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के सामने कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं। समस्या कर्म करने में नहीं, बल्कि कर्म के परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति में है। इसलिए गीता कर्मयोग का मार्ग दिखाती है—कर्म करते हुए भी फल की चिंता को अपने ऊपर हावी न होने देना।

यहाँ ‘निष्काम कर्म’ की शिक्षा विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। निष्काम कर्म का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य किसी परिणाम की परवाह ही न करे या अपने कार्य को लापरवाही से करे। इसका गहरा अर्थ है कि वह अपने कर्तव्य को ईमानदारी से करे, लेकिन अपने सुख, अहंकार या स्वार्थ को कर्म का केंद्र न बनाए। जब मनुष्य हर काम के पीछे केवल अपना लाभ खोजता है, तब कर्म उसे बाँधने लगता है। लेकिन वही कर्म जब कर्तव्य और ईश्वरार्पण की भावना से किया जाता है, तो वह साधना बन सकता है।

स्वामी रामसुखदास जी की व्याख्या में समर्पण का बहुत महत्व है। मनुष्य जीवन में लगातार यह सोचता रहता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में होना चाहिए। वह भविष्य को नियंत्रित करना चाहता है, लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार बदलना चाहता है और परिस्थितियों को अपने पक्ष में करना चाहता है। इसी प्रयास में चिंता बढ़ती जाती है। गीता मनुष्य को एक दूसरी दृष्टि देती है—अपने कर्तव्य का पूरा प्रयास करो, लेकिन अंतिम परिणाम को लेकर अहंकारपूर्ण आग्रह मत रखो। परमात्मा के प्रति समर्पण का अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि अपने सीमित अहंकार को छोड़कर ईश्वर की व्यवस्था पर विश्वास करना है।

मन पर नियंत्रण भी गीता की साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। मन स्वभाव से चंचल है। वह कभी अतीत में जाता है, कभी भविष्य की चिंता करता है और कभी वर्तमान में इच्छाओं और भय के बीच उलझा रहता है। स्वामी रामसुखदास जी साधक को मन से लड़ने के बजाय उसे समझने और धीरे-धीरे सही दिशा में लगाने की प्रेरणा देते हैं। मनुष्य जिस विषय पर बार-बार चिंतन करता है, उसी से उसका लगाव बढ़ता है। लगाव से इच्छा पैदा होती है, इच्छा पूरी न होने पर क्रोध और अशांति जन्म ले सकती है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में विचारों की दिशा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गीता में समत्व की शिक्षा इसी संदर्भ में आती है। सुख आए तो मन अत्यधिक उछल न जाए और दुःख आए तो पूरी तरह टूट न जाए—यह संतुलन साधना का महत्वपूर्ण संकेत है। स्वामी रामसुखदास जी के अनुसार संसार में परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहती हैं। यदि मनुष्य अपनी शांति को परिस्थितियों से जोड़ देगा, तो उसकी शांति भी परिस्थितियों के साथ बदलती रहेगी। वास्तविक साधना यह है कि बाहरी परिवर्तन के बीच भीतर की दृष्टि स्थिर होती जाए।

इसके साथ ही पुस्तक भक्ति को जीवन का अत्यंत सरल और सहज मार्ग बताती है। भक्ति केवल पूजा-पाठ की बाहरी क्रिया नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप परमात्मा के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण में है। जब मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को ईश्वर से जोड़ना शुरू करता है, तब सामान्य जीवन भी साधना बन सकता है। भोजन करना, काम करना, परिवार की सेवा करना, दूसरों की सहायता करना और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना—इन सबमें ईश्वर की स्मृति और समर्पण की भावना लाई जा सकती है।

स्वामी रामसुखदास जी विशेष रूप से ईश्वर-प्राप्ति को मनुष्य जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य मानने वाली गीता-दृष्टि पर जोर देते हैं। संसार में धन, प्रतिष्ठा, सुविधा और सफलता की अपनी जगह है, लेकिन ये सभी परिवर्तनशील हैं। मनुष्य यदि इन्हें ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान ले, तो प्राप्त होने के बाद भी संतोष स्थायी नहीं होता। एक इच्छा पूरी होती है और दूसरी पैदा हो जाती है। गीता मनुष्य को उस आनंद की ओर मोड़ती है जो बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है।

इस संदर्भ में वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है। स्वामी रामसुखदास जी की व्याख्या में वैराग्य का अर्थ संसार के प्रति सही दृष्टि विकसित करना है। गृहस्थ व्यक्ति भी वैरागी हो सकता है यदि वह संसार में रहते हुए संसार को अपना अंतिम आश्रय न माने। परिवार से प्रेम किया जा सकता है, जिम्मेदारियाँ निभाई जा सकती हैं, धन कमाया जा सकता है और सामाजिक जीवन जिया जा सकता है, लेकिन भीतर यह समझ बनी रहनी चाहिए कि ये सभी वस्तुएँ और संबंध परिवर्तनशील हैं।

गीता की एक और महत्वपूर्ण शिक्षा अहंकार का त्याग है। मनुष्य अक्सर अपने कर्मों का श्रेय स्वयं को देता है। वह सोचता है कि मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ। यही ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव बंधन को मजबूत करता है। गीता मनुष्य को यह समझने की ओर ले जाती है कि शरीर, बुद्धि, इंद्रियाँ, परिस्थितियाँ और अवसर—सब अनेक कारणों से मिलकर काम करते हैं। इसलिए सफलता मिलने पर अहंकार और असफलता आने पर आत्मग्लानि—दोनों से ऊपर उठना आवश्यक है।

ज्ञान और भक्ति का संबंध भी पुस्तक में महत्वपूर्ण है। ज्ञान केवल बौद्धिक जानकारी नहीं है। किसी सिद्धांत को पढ़ लेना और उसे जीवन में जीना अलग बातें हैं। वास्तविक ज्ञान तब प्रभावी होता है जब वह व्यवहार में उतरता है। इसी प्रकार भक्ति केवल भावुकता नहीं है। सच्ची भक्ति जीवन को बदलती है। वह मनुष्य में विनम्रता, प्रेम, सहनशीलता, सेवा और विश्वास पैदा करती है। इस प्रकार ज्ञान, कर्म और भक्ति अलग-अलग रास्ते न होकर साधना के परस्पर जुड़े हुए आयाम बन जाते हैं।

गीता में त्याग की चर्चा भी इसी व्यापक दृष्टि से होती है। त्याग का अर्थ केवल वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है। व्यक्ति बहुत कुछ बाहर से छोड़ सकता है, लेकिन यदि भीतर इच्छा, अहंकार और आसक्ति बनी रहे तो वास्तविक त्याग नहीं हुआ। इसके विपरीत कोई व्यक्ति संसार में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी भीतर से आसक्ति को कम कर सकता है। इसलिए स्वामी रामसुखदास जी बाहरी जीवन से अधिक आंतरिक दृष्टि पर ध्यान देते हैं।

‘साधक संजीवनी’ का एक विशेष गुण इसकी व्यावहारिकता है। यह पाठक को केवल बड़े आध्यात्मिक प्रश्नों के बारे में सोचने के लिए नहीं छोड़ती, बल्कि उसे अपने रोजमर्रा के जीवन को देखने का नया तरीका देती है। परिवार में तनाव हो, कार्यक्षेत्र में असफलता हो, किसी प्रिय व्यक्ति से वियोग हो, धन की चिंता हो, सम्मान की इच्छा हो या भविष्य का भय—गीता की शिक्षा इन सभी परिस्थितियों को देखने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है।

इस पुस्तक का मूल संदेश धीरे-धीरे एक बहुत सरल सत्य की ओर ले जाता है: मनुष्य की समस्या केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं हैं; समस्या उन परिस्थितियों के प्रति उसकी आसक्ति, अपेक्षा और प्रतिक्रिया भी है। परिस्थितियाँ हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन उनके प्रति हमारी दृष्टि और अपने कर्तव्य के प्रति हमारा रवैया साधना का विषय बन सकता है।

अंततः ‘गीता साधक संजीवनी’ श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने वाली साधना के रूप में प्रस्तुत करती है। स्वामी रामसुखदास जी की सरल और आत्मीय शैली पाठक को यह अनुभव कराती है कि गीता किसी एक युग या किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं है। अर्जुन का प्रश्न आज भी मनुष्य का प्रश्न है और श्रीकृष्ण का उत्तर आज भी जीवन के संघर्षों में अर्थ खोजने वाले व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है।

इस ग्रंथ का अंतिम आह्वान संसार से भागने का नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी दृष्टि बदलने का है। अपने कर्तव्य को ईमानदारी से करना, कर्म के फल की अत्यधिक आसक्ति छोड़ना, मन को ईश्वर की ओर लगाना, सुख-दुःख में संतुलित रहना, अहंकार को कम करना, दूसरों की सेवा करना और अंततः अपने जीवन को परमात्मा को समर्पित करना—यही उस साधना की दिशा है जिसे ‘साधक संजीवनी’ सामने रखती है।

इस दृष्टि से यह पुस्तक केवल गीता की व्याख्या नहीं, बल्कि एक साधक के लिए जीवन का मार्गदर्शन है। यह बताती है कि आध्यात्मिकता किसी विशेष समय या स्थान तक सीमित नहीं है। जब मनुष्य अपने सामान्य कर्मों को सही भावना से करने लगता है, अपने भीतर की अशांति को पहचानता है और हर परिस्थिति में परमात्मा की ओर लौटना सीखता है, तब उसका पूरा जीवन धीरे-धीरे साधना बन सकता है। यही ‘गीता साधक संजीवनी’ की सबसे सुंदर और मानवीय शिक्षा है—परिवर्तन बाहर की दुनिया को बदलने से पहले भीतर की दृष्टि बदलने से शुरू होता है।

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