Shrimad Bhagwat Geeta Yatharoop

A.C. Bhaktivendanta Swami Prabhupada

Hardcover • 644 Pages • ₹ 480.00 • Hindi • 9789385986185
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Publisher Bhaktivedanta Book Trust
ISBN13 9789385986185
ASIN/SKU 938598618X
Book Format Hardcover
Language Hindi
Pages 644
List Price ₹ 480.00
Publishing Date 01/01/2019
Dimensions 20.3 x 25.4 x 4.7 cm
Weight 430 g
Book Code BD00070718

Discover Shrimad Bhagwat Geeta Yatharoop by A.C. Bhaktivendanta Swami Prabhupada. This book is published by Bhaktivedanta Book Trust in Hardcover format, ISBN 9789385986185, ASIN 938598618X, under Religion and Spirituality, Religion Encyclopedias, Hinduism.

Book Description

The largest-selling edition of the Gita all over the world, Bhagavad-Gita as It Is, is more than a book. For many it has changed their lives altogether. Universally Bhagavad-Gita is renowned and truly claimed as the crown jewel of India?s spiritual wisdom. Spoken by Lord Krishna the Supreme Personality of Godhead to His intimate disciple Arjuna, the Gita’s seven hundred concise verses provides a definitive guide to the science of self realization. Complete wisdom with original sanskrit texts, word to word meaning, translation and purpot by His divine gracre A.C Bhakti Vedanta Swami Srila Prabhupada, Founder acharya of ISKCON

Author Biography

His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada (1896-1977) is widely regarded as the foremost Vedic scholar, translator, and teacher of the modern era. He is especially respected as the world's most prominent contemporary authority on bhakti-yoga, devotional service to the Supreme Person, Krishna, as taught by the ancient Vedic writings of India. He is also the founder-acharya of the International Society for Krishna Consciousness.

Srila Prabhupada, as he's known to his followers, translated and commented on over eighty volumes of the Vedas' most important sacred bhakti texts, including the Bhagavad-gita—a concise handbook for understanding the purpose and goal of human life—and the multi-volume Srimad-Bhagavatam—an epic biography of Krishna, Krishna's avatars, and His many devotees throughout the history of the universe.

Srila Prabhupada's own spiritual master, Srila Bhaktisiddhanta Sarasvati Thakur, was the leading proponent of Krishna consciousness in India during the early part of the twentieth century. He specifically taught the philosophy of Chaitanya Mahaprabhu, the divine avatar who revived Krishna-bhakti all over India in the 1500s. When Srila Bhaktisiddhanta first met the young man later known as Srila Prabhupada - in Calcutta in 1922 - he urged him to preach Chaitanya Mahaprabhu's message of Krishna consciousness throughout the English-speaking world.

After forty years of struggling within India to carry out his guru's order, while maintaining family and business responsibilities, Srila Prabhupada boarded a steamship bound from Calcutta to New York City in 1965. At age sixty-nine, with forty rupees and a trunk of his Bhagavatam commentaries - the first ever in English - his aim was to introduce "India's message of peace and goodwill" to the western world. During the last twelve years of his life, Srila Prabhupada would inspire thousands of Westerners and Indians to devote their lives to Krishna consciousness, launching one of the fastest-growing spiritual movements in the history of the world.

Many scholars and professors who met him and became familiar with his work continue to use Srila Prabhupada's books as standard university texts, and regard him as a genuine, realized, and scholarly teacher of bhakti. His authoritative yet down-to-earth presentation of Vedas continues to inspire a worldwide audience.

With the help of his students, he founded the International Society for Krishna Consciousness (ISKCON). ISKCON is popularly known as the "Hare Krishna" movement, due to its members' widespread practice of chanting the Hare Krishna mantra in public. Srila Prabhupada intended ISKCON to facilitate the association and education of bhakti-yoga practitioners, and his followers continue to spread that mission.

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Book Summary

श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप आचार्य ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा प्रस्तुत भगवद्गीता का एक प्रसिद्ध वैष्णव भाष्य और अनुवाद है। यह ग्रंथ केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध की कथा नहीं बताता, बल्कि मनुष्य के जीवन, उसके कर्तव्य, आत्मा, परमात्मा, कर्म, ज्ञान, भक्ति, मृत्यु और जीवन के अंतिम उद्देश्य पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करता है। स्वामी प्रभुपाद भगवद्गीता की शिक्षाओं को कृष्ण-केंद्रित दृष्टि से समझाते हैं और बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि शाश्वत आत्मा है। उनके अनुसार जीवन का परम उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण के साथ अपने सनातन संबंध को समझना और प्रेमपूर्ण भक्ति के माध्यम से उस संबंध को पुनः जागृत करना है।

ग्रंथ की शुरुआत एक अत्यंत मानवीय परिस्थिति से होती है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन अपने ही संबंधियों, गुरुजनों, मित्रों और प्रियजनों को अपने सामने खड़ा देखकर गहरे विषाद में डूब जाता है। वह एक महान योद्धा है, लेकिन युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले उसका मन विचलित हो जाता है। उसके हाथ से गांडीव छूटने लगता है, शरीर कांपता है और वह युद्ध करने के औचित्य पर प्रश्न उठाता है। उसे लगता है कि अपने ही लोगों को मारकर प्राप्त राज्य, सुख और विजय का क्या मूल्य होगा। यही अर्जुन का संकट भगवद्गीता के संवाद का आधार बनता है।

स्वामी प्रभुपाद के भाष्य में अर्जुन का यह संकट केवल एक ऐतिहासिक परिस्थिति नहीं रह जाता। यह प्रत्येक मनुष्य की उस स्थिति का प्रतीक बन जाता है जब जीवन में कठिन निर्णय सामने आते हैं और बुद्धि, भावनाओं तथा कर्तव्य के बीच संघर्ष उत्पन्न होता है। हम भी अनेक बार यह सोचते हैं कि सही क्या है, अपने कर्तव्य को कैसे निभाया जाए, सुख-दुःख का सामना कैसे किया जाए और जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है। कृष्ण और अर्जुन का संवाद इन्हीं प्रश्नों का आध्यात्मिक उत्तर खोजता है।

कृष्ण की पहली महत्वपूर्ण शिक्षा आत्मा की अमरता के संबंध में है। अर्जुन जिन लोगों की मृत्यु से भयभीत है, कृष्ण उसे समझाते हैं कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। शरीर जन्म लेता है, बढ़ता है, बदलता है और अंततः समाप्त हो जाता है, जबकि आत्मा का न जन्म होता है और न वास्तविक अर्थ में मृत्यु। स्वामी प्रभुपाद इस सिद्धांत को भगवद्गीता की मूल शिक्षाओं में से एक मानते हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह स्वयं को शरीर समझ लेता है। इस देहाभिमान के कारण वह सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि और जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है।

आत्मा और शरीर के इस अंतर को समझना केवल दार्शनिक जानकारी प्राप्त करना नहीं है। इसका उद्देश्य जीवन को देखने की दृष्टि बदलना है। यदि व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मानता है, तो उसकी सारी पहचान बाहरी वस्तुओं पर निर्भर हो जाती है। लेकिन यदि वह स्वयं को चेतन आत्मा के रूप में समझता है, तो जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण अधिक गहरा हो सकता है। शरीर बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, संबंधों के रूप बदलते हैं, लेकिन आत्मा की आध्यात्मिक पहचान बनी रहती है।

इसके बाद कृष्ण अर्जुन को कर्तव्य और कर्मयोग की शिक्षा देते हैं। मनुष्य कर्म किए बिना रह नहीं सकता। इसलिए समस्या कर्म करने में नहीं, बल्कि कर्म के पीछे की चेतना में है। स्वामी प्रभुपाद के अनुसार मनुष्य को अपने निर्धारित कर्तव्य को भगवान की सेवा की भावना से करना चाहिए और कर्म के फल पर स्वार्थपूर्ण अधिकार की भावना नहीं रखनी चाहिए। यही कर्मयोग की भावना है।

अर्जुन युद्ध से भागना चाहता है क्योंकि उसे युद्ध के परिणामों से भय और मोह हो गया है। कृष्ण उसे समझाते हैं कि केवल कठिनाई से बचने के लिए कर्तव्य से पलायन उचित नहीं है। मनुष्य को अपने कर्तव्य को समझना चाहिए और उसे सही चेतना के साथ पूरा करना चाहिए। यहां भगवद्गीता कर्म और संन्यास के बीच एक गहरी समझ प्रस्तुत करती है। केवल कर्म छोड़ देना ही त्याग नहीं है। वास्तविक त्याग कर्म के फल की स्वार्थपूर्ण आसक्ति छोड़ने में है।

स्वामी प्रभुपाद इस विचार को कृष्णभावनामृत, अर्थात कृष्ण के प्रति चेतना, से जोड़ते हैं। उनके अनुसार कर्म तब आध्यात्मिक बनता है जब उसे भगवान के लिए किया जाता है। भोजन करना, काम करना, ज्ञान प्राप्त करना, परिवार की जिम्मेदारी निभाना या समाज में अपनी भूमिका निभाना—इन सभी गतिविधियों का आध्यात्मिक मूल्य उस चेतना पर निर्भर करता है जिसके साथ वे किए जाते हैं। जब कर्म केवल व्यक्तिगत भोग और अहंकार के लिए किया जाता है, तो वह मनुष्य को कर्मबंधन में बांधता है। जब वही कर्म भगवान की सेवा के रूप में किया जाता है, तो वह मुक्ति की दिशा में ले जा सकता है।

ग्रंथ में ज्ञानयोग की भी चर्चा होती है। ज्ञान का उद्देश्य केवल संसार की वस्तुओं के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना नहीं है। वास्तविक ज्ञान व्यक्ति को आत्मा, प्रकृति, परमात्मा और जीवन के उद्देश्य को समझने में सहायता करता है। स्वामी प्रभुपाद के अनुसार केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। ज्ञान को आध्यात्मिक जीवन और भक्ति से जुड़ना चाहिए। यदि ज्ञान अहंकार बढ़ा दे और व्यक्ति को भगवान से दूर कर दे, तो वह पूर्ण ज्ञान नहीं है।

भगवद्गीता में मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने का विषय भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य की इंद्रियां निरंतर बाहरी विषयों की ओर आकर्षित होती हैं। आंखें सुंदर वस्तुओं की ओर, कान मधुर ध्वनियों की ओर, जीभ स्वाद की ओर और मन अनेक इच्छाओं की ओर दौड़ता रहता है। यदि मनुष्य इन इच्छाओं का दास बन जाए, तो उसकी शांति नष्ट हो जाती है। कृष्ण बताते हैं कि इंद्रियों को केवल दबाना पर्याप्त नहीं है; उन्हें उच्चतर और आध्यात्मिक उद्देश्य में लगाना आवश्यक है।

स्वामी प्रभुपाद के भाष्य में यही बात भक्ति के संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। मन को खाली करने के बजाय उसे कृष्ण की सेवा में लगाना अधिक प्रभावी मार्ग माना गया है। भगवान के नाम का स्मरण और जप, भगवान की कथाओं का श्रवण, भगवान की पूजा, प्रसाद ग्रहण करना और भक्तों की संगति—ये सब मन को आध्यात्मिक दिशा देने वाले साधन के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।

भगवद्गीता का एक महत्वपूर्ण भाग भक्ति योग है, और स्वामी प्रभुपाद की व्याख्या में यही सर्वोच्च साधना के रूप में उभरता है। उनके अनुसार मनुष्य भगवान को केवल निराकार, अस्पष्ट शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण को परम पुरुषोत्तम भगवान के रूप में समझ सकता है। कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण सेवा ही आत्मा के वास्तविक स्वभाव की अभिव्यक्ति है। आत्मा का स्वाभाविक धर्म भगवान की सेवा करना है, क्योंकि जीव भगवान का शाश्वत अंश है।

इसी संदर्भ में “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” का संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। कृष्ण अंत में अर्जुन से सभी प्रकार के आश्रयों को छोड़कर उनकी शरण में आने का आह्वान करते हैं। स्वामी प्रभुपाद इस श्लोक को भगवद्गीता की अंतिम और सर्वोच्च शिक्षा के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार मनुष्य अनेक प्रकार की पहचान और कर्तव्यों में उलझ सकता है, लेकिन उसकी मूल आध्यात्मिक पहचान भगवान का शाश्वत सेवक होना है।

भक्ति का अर्थ यहां केवल भावुक धार्मिकता नहीं है। इसमें श्रवण, कीर्तन, स्मरण और सेवा जैसी सक्रिय प्रक्रियाएं शामिल हैं। भगवान के नाम और गुणों का श्रवण करना, उनका कीर्तन करना, उनका स्मरण करना और जीवन को उनकी सेवा के लिए समर्पित करना भक्ति के महत्वपूर्ण अंग हैं। स्वामी प्रभुपाद विशेष रूप से हरे कृष्ण महामंत्र के जप को कृष्णभावनामृत की साधना से जोड़ते हैं। उनके अनुसार भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण मनुष्य को अपनी आध्यात्मिक पहचान की ओर लौटने में सहायता करता है।

ग्रंथ में पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। आत्मा शरीर बदलती रहती है, और उसके कर्म उसके भविष्य के अनुभवों को प्रभावित करते हैं। मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके कर्मों की एक अवस्था है, लेकिन उसका वास्तविक लक्ष्य केवल बेहतर भौतिक जीवन प्राप्त करना नहीं है। यदि वह केवल भौतिक इच्छाओं के पीछे चलता रहे, तो जन्म और मृत्यु का चक्र जारी रहता है। आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति इस चक्र से मुक्ति का मार्ग प्रदान करते हैं।

भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुण—सत्त्व, रज और तम—का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। सत्त्वगुण ज्ञान, शांति और संतुलन से जुड़ा है; रजोगुण इच्छा, कर्म और बेचैनी से; जबकि तमोगुण अज्ञान, आलस्य और जड़ता से संबंधित है। मनुष्य का व्यवहार, भोजन, सोच, कर्म और जीवन की प्रवृत्तियां इन गुणों से प्रभावित होती हैं। लेकिन कृष्ण केवल सत्त्वगुण तक पहुंचने को अंतिम लक्ष्य नहीं बताते। आत्मा को इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक चेतना में स्थित होना है।

स्वामी प्रभुपाद इस शिक्षा को दैनिक जीवन से जोड़ते हुए बताते हैं कि मनुष्य अपने भोजन, संगति, गतिविधियों और विचारों के माध्यम से अपनी चेतना को प्रभावित करता है। शुद्ध और सात्त्विक जीवन मन को अधिक शांत बना सकता है, लेकिन अंतिम उद्देश्य कृष्ण के प्रति भक्ति है। इस प्रकार भगवद्गीता केवल विचारों का ग्रंथ नहीं रहती; वह जीवन जीने की एक समग्र आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत करती है।

विराट रूप का वर्णन ग्रंथ के सबसे प्रभावशाली प्रसंगों में से एक है। जब अर्जुन कृष्ण की वास्तविक दिव्य सत्ता को और स्पष्ट रूप से देखना चाहता है, तब कृष्ण उसे दिव्य दृष्टि प्रदान करके अपना विराट रूप दिखाते हैं। अर्जुन उस रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड, असंख्य जीवों और काल की महान शक्ति को देखता है। यह अनुभव उसे कृष्ण की सर्वोच्चता का प्रत्यक्ष बोध कराता है। यहां मनुष्य की सीमित दृष्टि और परम सत्ता की व्यापकता के बीच का अंतर अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने आता है।

बाद के अध्यायों में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रकृति और पुरुष, दैवी और आसुरी संपत्तियों, श्रद्धा, त्याग और मोक्ष जैसे विषय आते हैं। कृष्ण बताते हैं कि मनुष्य के भीतर दैवी गुण—निडरता, सत्य, आत्मसंयम, करुणा, सरलता और विनम्रता—आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करते हैं। इसके विपरीत अहंकार, क्रोध, लोभ और अत्यधिक भौतिक आसक्ति व्यक्ति को बंधन की ओर ले जाते हैं।

अंततः अर्जुन का मोह दूर होता है। वह समझता है कि उसका वास्तविक कर्तव्य क्या है और वह कृष्ण के निर्देशानुसार कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है क्योंकि कृष्ण ने अर्जुन से उसकी स्वतंत्र इच्छा नहीं छीनी। उन्होंने उसे ज्ञान दिया, विभिन्न मार्गों को समझाया और अंत में निर्णय उसके ऊपर छोड़ दिया। अर्जुन समझने के बाद स्वयं निर्णय लेता है कि वह कृष्ण के निर्देश का पालन करेगा। इस प्रकार भगवद्गीता ज्ञान से निर्णय और निर्णय से कर्म की यात्रा बन जाती है।

श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपनी वास्तविक पहचान को शरीर और अहंकार से ऊपर उठाकर आत्मा के रूप में समझे और अपने जीवन को परम सत्य, अर्थात श्रीकृष्ण, से जोड़ने का प्रयास करे। स्वामी प्रभुपाद की व्याख्या में भक्ति इस यात्रा का केंद्र बनती है। कर्म को भगवान के लिए करना, ज्ञान से आत्मा की वास्तविक स्थिति समझना, मन और इंद्रियों को नियंत्रित करना तथा भगवान के नाम और स्वरूप का स्मरण करना—ये सभी साधन अंततः कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण की ओर ले जाते हैं।

इस पुस्तक की सबसे मानवीय विशेषता यह है कि इसकी शुरुआत किसी पूर्ण व्यक्ति से नहीं होती। अर्जुन भी भ्रमित होता है, दुखी होता है, प्रश्न करता है और निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है। कृष्ण उसे उसके प्रश्नों के लिए दोषी नहीं ठहराते। वे उसके भ्रम को ज्ञान का अवसर बना देते हैं। यही बात आज के पाठक के लिए भी अर्थपूर्ण है। जीवन में जब कर्तव्य, भावनाएं, भय और इच्छाएं आपस में टकराते हैं, तब केवल बाहरी सफलता पर्याप्त उत्तर नहीं देती। व्यक्ति को यह भी पूछना पड़ता है कि वह वास्तव में कौन है और उसके जीवन का अंतिम उद्देश्य क्या है।

अंततः श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप केवल युद्धभूमि में दिए गए उपदेश का अनुवाद नहीं, बल्कि आत्म-पहचान और ईश्वर-संबंध की ओर ले जाने वाला आध्यात्मिक ग्रंथ है। स्वामी प्रभुपाद की दृष्टि में मनुष्य की सबसे बड़ी भूल अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाना है और सबसे बड़ी उपलब्धि उस विस्मृत संबंध को पुनः पहचान लेना है। जीवन की परिस्थितियां बदलती रहेंगी, सुख और दुःख आते-जाते रहेंगे, शरीर भी बदल जाएगा, लेकिन आत्मा का आध्यात्मिक स्वरूप शाश्वत है। इसलिए मनुष्य का वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों की निरंतर खोज में नहीं, बल्कि अपने शाश्वत आध्यात्मिक संबंध को समझने में है। कृष्ण के प्रति प्रेम, सेवा, समर्पण और स्मरण के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को एक ऐसे मार्ग पर ले जा सकता है जो केवल सांसारिक सफलता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मिक शांति और परम आध्यात्मिक मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।

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