The Discovery of India (Hindi)
Jawaharlal Nehru, Dr. Rajendra Prasad Singh
Paperback
• 656 Pages
• ₹ 475.00
• Hindi
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| Publisher | Samyakprakashan |
|---|---|
| ASIN/SKU | B0FGDM1J7D |
| Book Format | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | 656 |
| List Price | ₹ 475.00 |
| Publishing Date | 04/07/2025 |
| Dimensions | 21.59 x 13.34 x 3.81 cm |
| Weight | 650 g |
| Book Code | BD00069832 |
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Discover The Discovery of India (Hindi) by Jawaharlal Nehru. This book is published by Samyakprakashan in Paperback format, ASIN B0FGDM1J7D, under History, Indian History.
Book Description
Discover the rich tapestry of Indian history through this Hindi translation of the seminal work 'The Discovery of India'. Originally penned in English, this comprehensive exploration of India's cultural and historical heritage has been thoughtfully translated to reach a wider Hindi-speaking audience. The book delves deep into India's past, examining its diverse traditions, philosophical foundations, and the evolution of its civilisation through the ages. This edition, published by Samyak Prakashan, features an introduction by Dr. Rajendra Prasad Singh, offering valuable context to modern readers. The narrative weaves together historical facts, personal observations, and scholarly analysis to present a multifaceted view of India's journey through time. Perfect for history enthusiasts, students, and anyone interested in understanding India's complex cultural legacy.
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Book Summary
भारत की खोज (The Discovery of India) भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है। यह पुस्तक उन्होंने वर्ष 1944 में अहमदनगर किले की जेल में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लिखी थी। यह केवल भारत के इतिहास का विवरण नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, राजनीति और राष्ट्रीय चेतना की एक गहन खोज भी है। नेहरू इस पुस्तक के माध्यम से यह समझने का प्रयास करते हैं कि भारत की पहचान कैसे बनी, उसकी सांस्कृतिक विरासत किन मूल्यों पर आधारित है, और विविधताओं से भरे इस विशाल देश को एक सूत्र में बाँधने वाली शक्ति क्या है। यह पुस्तक इतिहास, दर्शन और आत्मचिंतन का ऐसा संगम है जो भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक सतत विकसित होती सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करती है।
पुस्तक की शुरुआत नेहरू के आत्मचिंतन से होती है। जेल में बिताए गए समय ने उन्हें भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में गहराई से सोचने का अवसर दिया। वे स्वीकार करते हैं कि भारत को समझना आसान नहीं है, क्योंकि यह अनेक भाषाओं, धर्मों, जातियों, परंपराओं और जीवन-शैलियों का देश है। फिर भी वे पाते हैं कि इन विविधताओं के भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकता मौजूद है जिसने हजारों वर्षों तक भारत को जोड़े रखा है। यही एकता इस पुस्तक का केंद्रीय विषय बन जाती है।
नेहरू भारत की सभ्यता की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता से करते हैं। वे बताते हैं कि हजारों वर्ष पहले विकसित यह सभ्यता सुव्यवस्थित नगरों, उन्नत व्यापार, जल-प्रबंधन और सामाजिक संगठन का अद्भुत उदाहरण थी। इसके बाद वे वैदिक काल की चर्चा करते हैं, जहाँ वेदों, उपनिषदों और प्रारंभिक दार्शनिक विचारों का विकास हुआ। नेहरू के अनुसार भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने समय-समय पर नए विचारों को अपनाया और उन्हें अपनी सांस्कृतिक धारा में समाहित कर लिया।
पुस्तक में भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपराओं पर भी विस्तृत विचार किया गया है। नेहरू बताते हैं कि भारत में केवल एक ही विचारधारा नहीं रही, बल्कि अनेक मत और दर्शन समानांतर रूप से विकसित हुए। वे उपनिषदों के चिंतन, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और अन्य दार्शनिक परंपराओं की चर्चा करते हुए बताते हैं कि भारतीय समाज में सत्य की खोज, आत्मज्ञान और सहिष्णुता को विशेष महत्व दिया गया। उनके अनुसार भारत की शक्ति इसी बौद्धिक स्वतंत्रता और विचारों की विविधता में निहित है।
नेहरू भारतीय इतिहास में विभिन्न राजवंशों और साम्राज्यों का भी संतुलित वर्णन करते हैं। वे मौर्य साम्राज्य के सम्राट अशोक को एक ऐसे शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिन्होंने युद्ध के बाद अहिंसा, करुणा और नैतिक शासन का मार्ग अपनाया। इसके बाद वे गुप्त काल को भारतीय संस्कृति, साहित्य, विज्ञान और कला का स्वर्ण युग बताते हैं। इस काल में गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और साहित्य में उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण भाग भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों और उनके प्रभावों का विश्लेषण है। नेहरू बताते हैं कि इतिहास में अनेक विदेशी शासक भारत आए, लेकिन भारतीय संस्कृति ने उन्हें केवल स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उनके साथ संवाद स्थापित करते हुए नए सांस्कृतिक रूपों का निर्माण भी किया। विशेष रूप से वे मुगल काल की चर्चा करते हुए बताते हैं कि इस युग में कला, स्थापत्य, संगीत और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण विकास हुआ। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति की विशेषता संघर्ष से अधिक समन्वय की रही है।
नेहरू ब्रिटिश शासन का विश्लेषण भी गंभीरता से करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि अंग्रेज़ी शासन के दौरान आधुनिक शिक्षा, रेल, डाक व्यवस्था और कुछ प्रशासनिक सुधार हुए, लेकिन साथ ही वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उपनिवेशवाद का मूल उद्देश्य भारत का आर्थिक और राजनीतिक शोषण था। ब्रिटिश शासन ने भारत के पारंपरिक उद्योगों को कमजोर किया, आर्थिक असमानता बढ़ाई और जनता को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा। यही परिस्थितियाँ धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन के विकास का कारण बनीं।
पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वर्णन केवल राजनीतिक घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण के रूप में किया गया है। नेहरू बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन ने विभिन्न धर्मों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोगों को एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट किया। वे विशेष रूप से महात्मा गांधी के नेतृत्व की चर्चा करते हैं और बताते हैं कि गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और जनभागीदारी के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को एक नैतिक आंदोलन का स्वरूप दिया। उनके अनुसार गांधीजी ने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि समाज सेवा और नैतिक मूल्यों का माध्यम बनाया।
नेहरू भारत की सांस्कृतिक विविधता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं। वे कहते हैं कि भारत में अनेक धर्म, भाषाएँ और परंपराएँ होने के बावजूद लोगों के जीवन में कुछ साझा मूल्य सदैव मौजूद रहे हैं—जैसे सहिष्णुता, आध्यात्मिकता, ज्ञान की खोज और विभिन्न संस्कृतियों के प्रति सम्मान। यही साझा विरासत भारत की राष्ट्रीय पहचान का आधार है। उनके अनुसार भारत की एकता किसी एक भाषा, धर्म या जाति पर आधारित नहीं है, बल्कि विविधताओं के बीच सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित है।
पुस्तक में विज्ञान और आधुनिकता के महत्व पर भी विशेष बल दिया गया है। नेहरू मानते हैं कि केवल अतीत के गौरव पर गर्व करना पर्याप्त नहीं है। यदि भारत को आगे बढ़ना है, तो उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधारों को अपनाना होगा। वे अंधविश्वास, संकीर्णता और सामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हैं तथा एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहाँ ज्ञान, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोच्च स्थान मिले।
नेहरू यह भी स्पष्ट करते हैं कि इतिहास का उद्देश्य केवल अतीत का गुणगान करना नहीं है। इतिहास हमें अपनी सफलताओं और गलतियों दोनों से सीखने का अवसर देता है। वे पाठकों को प्रेरित करते हैं कि वे भारत की महान परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन साथ ही वर्तमान की चुनौतियों का सामना वैज्ञानिक सोच, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता की भावना के साथ करें।
भारत की खोज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक विचारधारा या समुदाय की कहानी नहीं कहती। इसके बजाय यह भारत को एक ऐसी जीवंत सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसने हजारों वर्षों में अनेक संस्कृतियों, विचारों और अनुभवों को आत्मसात करते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। पुस्तक इतिहास को केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की निरंतर यात्रा के रूप में देखने की प्रेरणा देती है।
अंततः The Discovery of India केवल भारत के अतीत का वर्णन नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को समझने का एक गंभीर प्रयास है। यह पुस्तक बताती है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता, सांस्कृतिक समृद्धि और निरंतर परिवर्तन की क्षमता में निहित है। जवाहरलाल नेहरू का संदेश है कि यदि भारत अपने ऐतिहासिक अनुभवों से सीखते हुए विज्ञान, लोकतंत्र, सामाजिक समानता और मानवीय मूल्यों को अपनाए, तो वह भविष्य में भी एक सशक्त और प्रगतिशील राष्ट्र बना रह सकता है। इसी गहन दृष्टि और व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण भारत की खोज आज भी भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में गिनी जाती है।
पुस्तक की शुरुआत नेहरू के आत्मचिंतन से होती है। जेल में बिताए गए समय ने उन्हें भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में गहराई से सोचने का अवसर दिया। वे स्वीकार करते हैं कि भारत को समझना आसान नहीं है, क्योंकि यह अनेक भाषाओं, धर्मों, जातियों, परंपराओं और जीवन-शैलियों का देश है। फिर भी वे पाते हैं कि इन विविधताओं के भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकता मौजूद है जिसने हजारों वर्षों तक भारत को जोड़े रखा है। यही एकता इस पुस्तक का केंद्रीय विषय बन जाती है।
नेहरू भारत की सभ्यता की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता से करते हैं। वे बताते हैं कि हजारों वर्ष पहले विकसित यह सभ्यता सुव्यवस्थित नगरों, उन्नत व्यापार, जल-प्रबंधन और सामाजिक संगठन का अद्भुत उदाहरण थी। इसके बाद वे वैदिक काल की चर्चा करते हैं, जहाँ वेदों, उपनिषदों और प्रारंभिक दार्शनिक विचारों का विकास हुआ। नेहरू के अनुसार भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने समय-समय पर नए विचारों को अपनाया और उन्हें अपनी सांस्कृतिक धारा में समाहित कर लिया।
पुस्तक में भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपराओं पर भी विस्तृत विचार किया गया है। नेहरू बताते हैं कि भारत में केवल एक ही विचारधारा नहीं रही, बल्कि अनेक मत और दर्शन समानांतर रूप से विकसित हुए। वे उपनिषदों के चिंतन, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और अन्य दार्शनिक परंपराओं की चर्चा करते हुए बताते हैं कि भारतीय समाज में सत्य की खोज, आत्मज्ञान और सहिष्णुता को विशेष महत्व दिया गया। उनके अनुसार भारत की शक्ति इसी बौद्धिक स्वतंत्रता और विचारों की विविधता में निहित है।
नेहरू भारतीय इतिहास में विभिन्न राजवंशों और साम्राज्यों का भी संतुलित वर्णन करते हैं। वे मौर्य साम्राज्य के सम्राट अशोक को एक ऐसे शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिन्होंने युद्ध के बाद अहिंसा, करुणा और नैतिक शासन का मार्ग अपनाया। इसके बाद वे गुप्त काल को भारतीय संस्कृति, साहित्य, विज्ञान और कला का स्वर्ण युग बताते हैं। इस काल में गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और साहित्य में उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण भाग भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों और उनके प्रभावों का विश्लेषण है। नेहरू बताते हैं कि इतिहास में अनेक विदेशी शासक भारत आए, लेकिन भारतीय संस्कृति ने उन्हें केवल स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उनके साथ संवाद स्थापित करते हुए नए सांस्कृतिक रूपों का निर्माण भी किया। विशेष रूप से वे मुगल काल की चर्चा करते हुए बताते हैं कि इस युग में कला, स्थापत्य, संगीत और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण विकास हुआ। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति की विशेषता संघर्ष से अधिक समन्वय की रही है।
नेहरू ब्रिटिश शासन का विश्लेषण भी गंभीरता से करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि अंग्रेज़ी शासन के दौरान आधुनिक शिक्षा, रेल, डाक व्यवस्था और कुछ प्रशासनिक सुधार हुए, लेकिन साथ ही वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उपनिवेशवाद का मूल उद्देश्य भारत का आर्थिक और राजनीतिक शोषण था। ब्रिटिश शासन ने भारत के पारंपरिक उद्योगों को कमजोर किया, आर्थिक असमानता बढ़ाई और जनता को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा। यही परिस्थितियाँ धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन के विकास का कारण बनीं।
पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वर्णन केवल राजनीतिक घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण के रूप में किया गया है। नेहरू बताते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन ने विभिन्न धर्मों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोगों को एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट किया। वे विशेष रूप से महात्मा गांधी के नेतृत्व की चर्चा करते हैं और बताते हैं कि गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और जनभागीदारी के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को एक नैतिक आंदोलन का स्वरूप दिया। उनके अनुसार गांधीजी ने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि समाज सेवा और नैतिक मूल्यों का माध्यम बनाया।
नेहरू भारत की सांस्कृतिक विविधता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं। वे कहते हैं कि भारत में अनेक धर्म, भाषाएँ और परंपराएँ होने के बावजूद लोगों के जीवन में कुछ साझा मूल्य सदैव मौजूद रहे हैं—जैसे सहिष्णुता, आध्यात्मिकता, ज्ञान की खोज और विभिन्न संस्कृतियों के प्रति सम्मान। यही साझा विरासत भारत की राष्ट्रीय पहचान का आधार है। उनके अनुसार भारत की एकता किसी एक भाषा, धर्म या जाति पर आधारित नहीं है, बल्कि विविधताओं के बीच सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित है।
पुस्तक में विज्ञान और आधुनिकता के महत्व पर भी विशेष बल दिया गया है। नेहरू मानते हैं कि केवल अतीत के गौरव पर गर्व करना पर्याप्त नहीं है। यदि भारत को आगे बढ़ना है, तो उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधारों को अपनाना होगा। वे अंधविश्वास, संकीर्णता और सामाजिक असमानताओं की आलोचना करते हैं तथा एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहाँ ज्ञान, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोच्च स्थान मिले।
नेहरू यह भी स्पष्ट करते हैं कि इतिहास का उद्देश्य केवल अतीत का गुणगान करना नहीं है। इतिहास हमें अपनी सफलताओं और गलतियों दोनों से सीखने का अवसर देता है। वे पाठकों को प्रेरित करते हैं कि वे भारत की महान परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन साथ ही वर्तमान की चुनौतियों का सामना वैज्ञानिक सोच, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता की भावना के साथ करें।
भारत की खोज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक विचारधारा या समुदाय की कहानी नहीं कहती। इसके बजाय यह भारत को एक ऐसी जीवंत सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसने हजारों वर्षों में अनेक संस्कृतियों, विचारों और अनुभवों को आत्मसात करते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। पुस्तक इतिहास को केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की निरंतर यात्रा के रूप में देखने की प्रेरणा देती है।
अंततः The Discovery of India केवल भारत के अतीत का वर्णन नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को समझने का एक गंभीर प्रयास है। यह पुस्तक बताती है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता, सांस्कृतिक समृद्धि और निरंतर परिवर्तन की क्षमता में निहित है। जवाहरलाल नेहरू का संदेश है कि यदि भारत अपने ऐतिहासिक अनुभवों से सीखते हुए विज्ञान, लोकतंत्र, सामाजिक समानता और मानवीय मूल्यों को अपनाए, तो वह भविष्य में भी एक सशक्त और प्रगतिशील राष्ट्र बना रह सकता है। इसी गहन दृष्टि और व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण भारत की खोज आज भी भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को समझने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकों में गिनी जाती है।
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