कहाँ से आए हैं… कहाँ जाना है ?
Paperback
• 146 Pages
• ₹ 200.00
• Hindi
• 9789377704582
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| Publisher | Motilal Banarsidass Publishing House |
|---|---|
| ISBN13 | 9789377704582 |
| ASIN/SKU | 9377704588 |
| Book Format | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | 146 |
| List Price | ₹ 200.00 |
| Publishing Date | 25/03/2026 |
| Dimensions | 22 x 15 x 2.5 cm |
| Weight | 499 g |
| Book Code | BD00069491 |
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Discover कहाँ से आए हैं… कहाँ जाना है ? by MaasterG. This book is published by Motilal Banarsidass Publishing House in Paperback format, ISBN 9789377704582, ASIN 9377704588, under Religion and Spirituality.
Book Description
कभी सोचा या महसूस किया, सब कुछ होते हुए भी मन उदास व खाली क्यों है ? प्रेम के नाम पर सिर्फ व्यापार और धोखा है । MAAsterG इन्हीं प्रश्नों के उत्तर इस पुस्तक में दे रहे हैं। यह पुस्तक भाग-दौड़ और जीवन की कठिनाइयों के बीच उस प्रेम की ओर ले जाती है, जो भीतर शांति और आनंद पैदा करती है। सरल भाषा में दिया गया ज्ञान पाठक को प्रेम, परमात्मा व आनंद की ओर ले जाता है। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए है जो रिश्तों में सुकून व जीवन में खुशी व शांति चाहते हैं ।
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Book Summary
MAAsterG की पुस्तक "कहाँ से आये हैं... कहाँ से आये हैं? (कहाँ से आये हैं... कहाँ जाना है?)" एक गहन आध्यात्मिक चिंतन पर आधारित कृति है, जो मनुष्य के जीवन से जुड़े सबसे मूलभूत प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करती है। पुस्तक का केंद्रीय उद्देश्य पाठक को केवल धार्मिक मान्यताओं या दार्शनिक सिद्धांतों से परिचित कराना नहीं, बल्कि उसे स्वयं के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने की दिशा में प्रेरित करना है। लेखक का मानना है कि जब तक मनुष्य यह नहीं समझता कि वह वास्तव में कौन है, कहाँ से आया है और जीवन की अंतिम मंज़िल क्या है, तब तक उसका जीवन अधूरा और भ्रम से भरा रहेगा। यह पुस्तक आत्म-जागरण, चेतना और आंतरिक शांति की यात्रा का आमंत्रण देती है तथा जीवन के गहरे प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
पुस्तक की शुरुआत इसी मूल प्रश्न से होती है कि मनुष्य अपने अस्तित्व को केवल शरीर और मन तक सीमित क्यों मान लेता है। लेखक बताते हैं कि अधिकांश लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक बाहरी उपलब्धियों, इच्छाओं और भौतिक सुखों के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करते। यही अज्ञान उनके दुःखों का सबसे बड़ा कारण बनता है। लेखक के अनुसार, जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल जीविका कमाना, परिवार बसाना या सामाजिक सफलता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर छिपी उस चेतना को पहचानना है जो शरीर और परिस्थितियों से परे है। यह दृष्टिकोण पुस्तक को एक साधारण आध्यात्मिक ग्रंथ से आगे ले जाकर आत्म-अनुभूति की दिशा में ले जाता है।
लेखक बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना है। शरीर समय के साथ बदलता है, वृद्ध होता है और एक दिन समाप्त हो जाता है, जबकि चेतना शाश्वत है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मान लेता है, तब वह भय, मोह, क्रोध, ईर्ष्या और असुरक्षा से घिर जाता है। इसके विपरीत, जब वह अपने भीतर की चेतना को पहचानना शुरू करता है, तब जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है। वह परिस्थितियों का दास बनने के बजाय उनका साक्षी बन जाता है। लेखक इस विचार को सरल उदाहरणों और सहज भाषा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं ताकि पाठक जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को भी आसानी से समझ सके।
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि मनुष्य का अधिकांश दुःख बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके अपने मन की गलत धारणाओं से उत्पन्न होता है। हम अपने विचारों, इच्छाओं और अहंकार के साथ इतनी गहरी पहचान बना लेते हैं कि वही हमारी वास्तविक पहचान प्रतीत होने लगती है। लेखक समझाते हैं कि जब तक मनुष्य अपने मन का निरीक्षण करना नहीं सीखता, तब तक वह बार-बार उन्हीं भावनात्मक संघर्षों में उलझा रहेगा। आत्मनिरीक्षण, सजगता और जागरूकता को वे आंतरिक परिवर्तन का आधार मानते हैं।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण विषय अहंकार की प्रकृति है। लेखक के अनुसार, अहंकार वह झूठी पहचान है जो मनुष्य को स्वयं से और दूसरों से अलग होने का भ्रम देती है। इसी कारण तुलना, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और संघर्ष जन्म लेते हैं। जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि सभी प्राणियों में एक ही चेतना विद्यमान है, तब उसके भीतर स्वाभाविक रूप से करुणा, प्रेम और स्वीकार्यता विकसित होने लगती है। लेखक इस परिवर्तन को किसी बाहरी अनुशासन का परिणाम नहीं, बल्कि सही समझ का स्वाभाविक फल बताते हैं।
पुस्तक में ध्यान और आत्मचिंतन की महत्ता पर भी विशेष बल दिया गया है। लेखक ध्यान को केवल आँखें बंद करके बैठने की क्रिया नहीं मानते, बल्कि हर क्षण सजग रहने की कला बताते हैं। उनका कहना है कि जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को बिना किसी निर्णय के देखना सीख जाता है, तभी उसके भीतर वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है। इस सजगता के माध्यम से व्यक्ति धीरे-धीरे भय, तनाव और मानसिक अशांति से मुक्त होकर आंतरिक संतुलन प्राप्त कर सकता है।
लेखक जीवन और मृत्यु के विषय पर भी गहराई से विचार करते हैं। वे बताते हैं कि मृत्यु का भय इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है। यदि वह अपने वास्तविक स्वरूप को चेतना के रूप में पहचान ले, तो मृत्यु केवल एक परिवर्तन प्रतीत होगी, अंत नहीं। इस दृष्टिकोण से पुस्तक जीवन के प्रति सकारात्मक और निर्भय दृष्टि विकसित करने का प्रयास करती है। साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि वर्तमान क्षण ही जीवन का वास्तविक केंद्र है; अतीत का पछतावा और भविष्य की चिंता मनुष्य को वर्तमान के आनंद से दूर कर देती है।
पुस्तक में आध्यात्मिकता को किसी विशेष धर्म, संप्रदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रखा गया है। लेखक का दृष्टिकोण सार्वभौमिक है। वे बताते हैं कि सत्य का अनुभव किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है, चाहे उसका धर्म, संस्कृति या पृष्ठभूमि कुछ भी हो। इसलिए पुस्तक का संदेश विभाजन के बजाय एकता, प्रेम और आत्मबोध पर आधारित है। यह पाठक को अंधविश्वासों से ऊपर उठकर प्रत्यक्ष अनुभव और स्वयं की खोज की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
पुस्तक का निष्कर्ष यह है कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बाहरी संसार के बारे में नहीं, बल्कि स्वयं के बारे में है। "मैं कौन हूँ?", "मैं कहाँ से आया हूँ?" और "मुझे कहाँ जाना है?"—इन प्रश्नों के उत्तर बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भीतर छिपे हैं। लेखक पाठक को यह विश्वास दिलाते हैं कि जब सही समझ विकसित होती है, तो जीवन में स्थायी शांति, संतोष और आनंद स्वतः प्रकट होने लगते हैं। यह यात्रा किसी विशेष उपलब्धि की नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की यात्रा है।
समग्र रूप से "कहाँ से आये हैं... कहाँ से आये हैं? (कहाँ से आये हैं... कहाँ जाना है?)" एक प्रेरणादायक आध्यात्मिक पुस्तक है, जो आत्मज्ञान, सजगता और आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से जीवन को समझने की नई दृष्टि प्रदान करती है। MAAsterG ने सरल, सहज और संवादात्मक शैली में गूढ़ आध्यात्मिक विषयों को प्रस्तुत किया है, जिससे यह पुस्तक केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी पाठकों के लिए उपयोगी बन जाती है जो जीवन के वास्तविक उद्देश्य, आत्मबोध और स्थायी सुख की खोज में हैं।
पुस्तक की शुरुआत इसी मूल प्रश्न से होती है कि मनुष्य अपने अस्तित्व को केवल शरीर और मन तक सीमित क्यों मान लेता है। लेखक बताते हैं कि अधिकांश लोग जन्म से लेकर मृत्यु तक बाहरी उपलब्धियों, इच्छाओं और भौतिक सुखों के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन स्वयं को जानने का प्रयास नहीं करते। यही अज्ञान उनके दुःखों का सबसे बड़ा कारण बनता है। लेखक के अनुसार, जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल जीविका कमाना, परिवार बसाना या सामाजिक सफलता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर छिपी उस चेतना को पहचानना है जो शरीर और परिस्थितियों से परे है। यह दृष्टिकोण पुस्तक को एक साधारण आध्यात्मिक ग्रंथ से आगे ले जाकर आत्म-अनुभूति की दिशा में ले जाता है।
लेखक बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना है। शरीर समय के साथ बदलता है, वृद्ध होता है और एक दिन समाप्त हो जाता है, जबकि चेतना शाश्वत है। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मान लेता है, तब वह भय, मोह, क्रोध, ईर्ष्या और असुरक्षा से घिर जाता है। इसके विपरीत, जब वह अपने भीतर की चेतना को पहचानना शुरू करता है, तब जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है। वह परिस्थितियों का दास बनने के बजाय उनका साक्षी बन जाता है। लेखक इस विचार को सरल उदाहरणों और सहज भाषा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं ताकि पाठक जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को भी आसानी से समझ सके।
पुस्तक में यह भी बताया गया है कि मनुष्य का अधिकांश दुःख बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके अपने मन की गलत धारणाओं से उत्पन्न होता है। हम अपने विचारों, इच्छाओं और अहंकार के साथ इतनी गहरी पहचान बना लेते हैं कि वही हमारी वास्तविक पहचान प्रतीत होने लगती है। लेखक समझाते हैं कि जब तक मनुष्य अपने मन का निरीक्षण करना नहीं सीखता, तब तक वह बार-बार उन्हीं भावनात्मक संघर्षों में उलझा रहेगा। आत्मनिरीक्षण, सजगता और जागरूकता को वे आंतरिक परिवर्तन का आधार मानते हैं।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण विषय अहंकार की प्रकृति है। लेखक के अनुसार, अहंकार वह झूठी पहचान है जो मनुष्य को स्वयं से और दूसरों से अलग होने का भ्रम देती है। इसी कारण तुलना, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और संघर्ष जन्म लेते हैं। जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि सभी प्राणियों में एक ही चेतना विद्यमान है, तब उसके भीतर स्वाभाविक रूप से करुणा, प्रेम और स्वीकार्यता विकसित होने लगती है। लेखक इस परिवर्तन को किसी बाहरी अनुशासन का परिणाम नहीं, बल्कि सही समझ का स्वाभाविक फल बताते हैं।
पुस्तक में ध्यान और आत्मचिंतन की महत्ता पर भी विशेष बल दिया गया है। लेखक ध्यान को केवल आँखें बंद करके बैठने की क्रिया नहीं मानते, बल्कि हर क्षण सजग रहने की कला बताते हैं। उनका कहना है कि जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को बिना किसी निर्णय के देखना सीख जाता है, तभी उसके भीतर वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है। इस सजगता के माध्यम से व्यक्ति धीरे-धीरे भय, तनाव और मानसिक अशांति से मुक्त होकर आंतरिक संतुलन प्राप्त कर सकता है।
लेखक जीवन और मृत्यु के विषय पर भी गहराई से विचार करते हैं। वे बताते हैं कि मृत्यु का भय इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है। यदि वह अपने वास्तविक स्वरूप को चेतना के रूप में पहचान ले, तो मृत्यु केवल एक परिवर्तन प्रतीत होगी, अंत नहीं। इस दृष्टिकोण से पुस्तक जीवन के प्रति सकारात्मक और निर्भय दृष्टि विकसित करने का प्रयास करती है। साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि वर्तमान क्षण ही जीवन का वास्तविक केंद्र है; अतीत का पछतावा और भविष्य की चिंता मनुष्य को वर्तमान के आनंद से दूर कर देती है।
पुस्तक में आध्यात्मिकता को किसी विशेष धर्म, संप्रदाय या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रखा गया है। लेखक का दृष्टिकोण सार्वभौमिक है। वे बताते हैं कि सत्य का अनुभव किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है, चाहे उसका धर्म, संस्कृति या पृष्ठभूमि कुछ भी हो। इसलिए पुस्तक का संदेश विभाजन के बजाय एकता, प्रेम और आत्मबोध पर आधारित है। यह पाठक को अंधविश्वासों से ऊपर उठकर प्रत्यक्ष अनुभव और स्वयं की खोज की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।
पुस्तक का निष्कर्ष यह है कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बाहरी संसार के बारे में नहीं, बल्कि स्वयं के बारे में है। "मैं कौन हूँ?", "मैं कहाँ से आया हूँ?" और "मुझे कहाँ जाना है?"—इन प्रश्नों के उत्तर बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने भीतर छिपे हैं। लेखक पाठक को यह विश्वास दिलाते हैं कि जब सही समझ विकसित होती है, तो जीवन में स्थायी शांति, संतोष और आनंद स्वतः प्रकट होने लगते हैं। यह यात्रा किसी विशेष उपलब्धि की नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की यात्रा है।
समग्र रूप से "कहाँ से आये हैं... कहाँ से आये हैं? (कहाँ से आये हैं... कहाँ जाना है?)" एक प्रेरणादायक आध्यात्मिक पुस्तक है, जो आत्मज्ञान, सजगता और आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से जीवन को समझने की नई दृष्टि प्रदान करती है। MAAsterG ने सरल, सहज और संवादात्मक शैली में गूढ़ आध्यात्मिक विषयों को प्रस्तुत किया है, जिससे यह पुस्तक केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी पाठकों के लिए उपयोगी बन जाती है जो जीवन के वास्तविक उद्देश्य, आत्मबोध और स्थायी सुख की खोज में हैं।
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