Gunahon Ka Devta

Dharamveer Bharti

Paperback • 200 Pages • ₹ 225.00 • Hindi
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Publisher Jnanpith Vani Prakashan LLP
ASIN/SKU B01MFDA7D5
Book Format Paperback
Language Hindi
Pages 200
List Price ₹ 225.00
Publishing Date 01/01/2014
Dimensions 21.5 x 14 x 1.2 cm
Weight 200 g
Book Code BD00069490

Discover Gunahon Ka Devta by Dharamveer Bharti. This book is published by Jnanpith Vani Prakashan LLP in Paperback format, ASIN B01MFDA7D5, under Literature and Fiction, Contemporary Fiction.

Book Description

गुनाहों का देवता - धर्मवीर भारती के इस उपन्यास का प्रकाशन और इसके प्रति पाठकों का अटूट सम्मोहन हिन्दी साहित्य-जगत् की एक बड़ी उपलब्धि बन गये हैं। दरअसल, यह उपन्यास हमारे समय में भारतीय भाषाओं की सबसे अधिक बिकनेवाली लोकप्रिय साहित्यिक पुस्तकों में पहली पंक्ति में है। लाखों-लाख पाठकों के लिए प्रिय इस अनूठे उपन्यास की माँग आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसी कि इसके प्रकाशन के प्रारम्भिक वर्षों में थी।—और इस सबका बड़ा कारण शायद एक समर्थ रचनाकार की कोई अव्यक्त पीड़ा और एकान्त आस्था है, जिसने इस उपन्यास को एक अद्वितीय कृति बना दिया है

Author Biography

धर्मवीर भारती - जन्म: 25 दिसम्बर, 1926; इलाहाबाद (उ.प्र.)। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर वहीं अध्यापन कार्य। कई पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े। अन्ततः धर्मयुग के सम्पादक के रूप में हिन्दी पत्रकारिता को नयी गरिमा प्रदान की। प्रमुख कृतियाँ : साँस की क़लम से, मेरी वाणी गैरिक वसना, कनुप्रिया, सात गीत वर्ष, ठण्डा लोहा, सपना अभी भी, गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा, बन्द गली का आख़िरी मकान, पश्यन्ती, कहनी अनकहनी, शब्दिता, अन्धा युग तथा मानव-मूल्य और साहित्य। 'पद्मश्री' सम्मान के साथ 'व्यास सम्मान' एवं अन्य अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत। निधन: 4 सितम्बर, 1997 ( मुम्बई)।

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Book Summary

धर्मवीर भारती का कालजयी उपन्यास "गुनाहों का देवता" हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय और भावनात्मक प्रेम कथाओं में से एक माना जाता है। पहली बार 1949 में प्रकाशित यह उपन्यास प्रेम, त्याग, सामाजिक मर्यादाओं, आत्मसंघर्ष और मानवीय संवेदनाओं की ऐसी कहानी प्रस्तुत करता है, जिसने दशकों से पाठकों के हृदय पर गहरी छाप छोड़ी है। इसकी कथा स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता के आरंभिक दौर के इलाहाबाद की पृष्ठभूमि में रची गई है, जहाँ शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के बीच मानवीय रिश्तों की जटिलताएँ आकार लेती हैं। इस उपन्यास के केंद्र में चंदर और सुधा का ऐसा प्रेम है, जो शब्दों से कम और भावनाओं से अधिक व्यक्त होता है। यही मौन प्रेम इसकी सबसे बड़ी शक्ति भी बनता है और सबसे गहरी त्रासदी भी।

कहानी का मुख्य पात्र चंदर कपूर एक प्रतिभाशाली, संवेदनशील और आदर्शवादी शोध छात्र है। वह अपने गुरु डॉ. शुक्ला का प्रिय शिष्य है और उनके परिवार का सदस्य जैसा बन चुका है। डॉ. शुक्ला की बेटी सुधा बचपन से ही चंदर की सबसे करीबी साथी है। दोनों के बीच गहरा अपनापन, विश्वास और आत्मीयता है। वे एक-दूसरे के बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन उनके संबंध को कभी स्पष्ट रूप से प्रेम का नाम नहीं दिया जाता। दोनों अपनी भावनाओं को सहज रूप से जीते हैं, परंतु सामाजिक मर्यादा, गुरु-शिष्य संबंध और अपनी झिझक उन्हें अपने प्रेम को स्वीकार करने से रोकती रहती है।

सुधा का स्वभाव सरल, निश्छल और प्रेम से भरा हुआ है। वह चंदर पर अटूट विश्वास करती है और अपने जीवन के हर निर्णय में उसकी राय को सर्वोपरि मानती है। दूसरी ओर, चंदर स्वयं को एक आदर्शवादी व्यक्ति मानता है। वह अपने गुरु के प्रति सम्मान और सामाजिक मूल्यों को अपने व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर रखता है। यही आदर्शवाद उसे उस निर्णय तक ले जाता है जहाँ वह स्वयं सुधा के विवाह के लिए एक योग्य वर खोजने में सहायता करता है। वह यह मान लेता है कि अपने प्रेम का त्याग करना ही उसके कर्तव्य और नैतिकता की जीत है। परंतु यही निर्णय उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल सिद्ध होता है।

सुधा अपने पिता और चंदर की इच्छा का सम्मान करते हुए विवाह स्वीकार कर लेती है। वह अपने नए जीवन में प्रवेश तो कर जाती है, लेकिन उसके मन में चंदर के लिए जो प्रेम है, वह कभी समाप्त नहीं होता। विवाह के बाद दोनों के बीच दूरी बढ़ जाती है, परंतु उनकी भावनाएँ पहले से कहीं अधिक गहरी और पीड़ादायक हो जाती हैं। चंदर धीरे-धीरे समझने लगता है कि उसने आदर्शों के नाम पर अपने जीवन की सबसे मूल्यवान अनुभूति खो दी है। उसे यह एहसास होता है कि प्रेम को दबाना और उससे भागना त्याग नहीं, बल्कि स्वयं के साथ किया गया अन्याय था।

सुधा के विवाह के बाद चंदर का जीवन भीतर से टूटने लगता है। वह अपनी पीड़ा से बचने के लिए अलग-अलग लोगों के साथ संबंध बनाने की कोशिश करता है। उसके जीवन में पम्मी, बिंती और अन्य पात्र आते हैं, जो प्रेम, आकर्षण, मित्रता और सामाजिक दृष्टिकोण के अलग-अलग रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पम्मी आधुनिक सोच वाली स्वतंत्र महिला है, जो प्रेम और शारीरिक संबंधों को पारंपरिक नैतिकता से अलग दृष्टि से देखती है। वहीं बिंती का चरित्र त्याग, धैर्य और सच्चे समर्पण का प्रतीक बनकर उभरता है। इन सभी संबंधों के माध्यम से चंदर अपने भीतर के खालीपन को भरने का प्रयास करता है, लेकिन उसे धीरे-धीरे यह समझ में आता है कि सच्चे प्रेम का कोई विकल्प नहीं हो सकता।

उपन्यास केवल प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर चलने वाले नैतिक संघर्षों का गहरा मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी है। चंदर बार-बार अपने निर्णयों पर प्रश्न उठाता है। वह समझने लगता है कि अत्यधिक आदर्शवाद जीवन को सरल नहीं, बल्कि अधिक जटिल बना देता है। कई बार समाज की बनाई हुई मर्यादाएँ और स्वयं के बनाए हुए सिद्धांत मनुष्य को उस सुख से दूर कर देते हैं, जिसका वह वास्तव में अधिकारी होता है। धर्मवीर भारती ने चंदर के मानसिक द्वंद्व को इतनी संवेदनशीलता से चित्रित किया है कि पाठक उसके दर्द, अपराधबोध और पश्चाताप को स्वयं महसूस करने लगते हैं।

उपन्यास में प्रेम को केवल दो व्यक्तियों के आकर्षण के रूप में नहीं, बल्कि आत्मिक जुड़ाव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चंदर और सुधा का संबंध शारीरिक निकटता से कहीं अधिक भावनात्मक और आध्यात्मिक है। वे एक-दूसरे के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन परिस्थितियाँ, सामाजिक अपेक्षाएँ और उनकी अपनी चुप्पी उन्हें साथ नहीं रहने देती। लेखक यह संदेश देते हैं कि केवल प्रेम होना पर्याप्त नहीं है; समय पर अपनी भावनाओं को स्वीकार करना और उनके लिए साहसपूर्वक खड़ा होना भी उतना ही आवश्यक है। यदि प्रेम को केवल त्याग के नाम पर दबा दिया जाए, तो वह जीवनभर का पछतावा बन सकता है।

धर्मवीर भारती ने उस समय के समाज की रूढ़ियों और विवाह संबंधी मान्यताओं पर भी गहरा प्रश्न उठाया है। विशेष रूप से महिलाओं के जीवन को उन्होंने अत्यंत संवेदनशील ढंग से चित्रित किया है। सुधा, बिंती और पम्मी जैसे पात्र समाज में स्त्री की अलग-अलग स्थितियों और संघर्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन पात्रों के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि सामाजिक नियमों का सबसे अधिक प्रभाव अक्सर महिलाओं के जीवन पर पड़ता है। साथ ही, वे यह भी बताते हैं कि पुरुष भी अपनी भावनाओं को दबाने और सामाजिक अपेक्षाओं के बोझ तले पीड़ित होते हैं।

उपन्यास का अंत अत्यंत मार्मिक और भावनात्मक है। इसमें किसी चमत्कार या सुखांत की अपेक्षा नहीं की गई है। इसके स्थान पर लेखक जीवन की उस सच्चाई को स्वीकार करते हैं कि कुछ रिश्ते अपने अधूरेपन में ही अमर हो जाते हैं। चंदर अंततः यह समझता है कि प्रेम का सबसे बड़ा शत्रु समाज नहीं, बल्कि उसका अपना भय, संकोच और अति-आदर्शवाद था। सुधा का त्याग, उसका मौन प्रेम और चंदर का जीवनभर का पश्चाताप पाठकों के मन में गहरी संवेदना छोड़ जाता है।

समग्र रूप से "गुनाहों का देवता" केवल एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, नैतिकता, सामाजिक बंधनों और मानवीय मनोविज्ञान का कालजयी दस्तावेज़ है। धर्मवीर भारती की सरल, काव्यात्मक और संवेदनशील भाषा इस उपन्यास को असाधारण ऊँचाई प्रदान करती है। यह रचना पाठकों को यह सोचने पर विवश करती है कि जीवन में केवल सही सिद्धांतों का होना पर्याप्त नहीं है; सही समय पर सही निर्णय लेने का साहस भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि "गुनाहों का देवता" आज भी हिंदी साहित्य की सबसे प्रिय और सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली कृतियों में गिना जाता है तथा प्रत्येक पीढ़ी के पाठकों को प्रेम, संबंधों और जीवन के वास्तविक अर्थ पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

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