Atomic Habits (Hindi)
Paperback
• 256 Pages
• ₹ 499.00
• Hindi
• 9789390085255
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| Publisher | Manjul Publishing House |
|---|---|
| ISBN13 | 9789390085255 |
| ASIN/SKU | 939008525X |
| Book Format | Paperback |
| Language | Hindi |
| Pages | 256 |
| List Price | ₹ 499.00 |
| Publishing Date | 20/09/2020 |
| Dimensions | 20.32 x 12.7 x 1.27 cm |
| Weight | 260 g |
| Book Code | BD00055095 |
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Discover Atomic Habits (Hindi) by James Clear. This book is published by Manjul Publishing House in Paperback format, ISBN 9789390085255, ASIN 939008525X, under Self-Help, Personal Transformation, Motivational Self-Help.
Book Description
लोग सोचते हैं कि जब आप अपने जीवन को बदलना चाहते हैं, तो आपको कुछ बड़ा सोचने की ज़रूरत होती है, लेकिन दुनिया के ख्याति प्राप्त आदतों के विशेषज्ञ जेम्स क्लियर ने एक अन्य तरीक़ा खोज निकाला है। उनका मानना है कि वास्तविक बदलाव सैकड़ों छोटे-छोटे निर्णयों के संयुक्त प्रभाव से आता है। छोटे निर्णयों में वे दो पुश-अप प्रतिदिन करने, पांच मिनट पहले जागने और मात्र एक पृष्ठ ज़्यादा पढ़ने जैसी बातों का उदाहरण देते हैं, जिन्हें वे एटॉमिक हैबिट्स कहते हैं। अपनी इस क्रांतिकारी किताब में क्लियर बताते हैं कि आख़िर कैसे छोटे-छोटे बदलाव जीवन को बदल देने वाले नतीजों में तब्दील हो जाते हैं। वे कुछ आसान तकनीकें बताते है जिससे किसी के जीवन में अस्त-व्यस्तता कम हो जाती है और जीवन अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। इन तकनीकों में वे आदतों को क्रमबद्ध करने की भुलाई जा चुकी कला, दो मिनट के नियम की अप्रत्याशित शक्ति और गोल्डी लॉक्स ज़ोन में प्रवेश करने की तरकीब का उल्लेख करते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के गहन शोध के आधार पर वे व्याख्या करते हैं कि ये छोटे बदलाव क्यों मायने रखते हैं। साथ ही वे उन ओलिंपिक स्वर्ण पदक विजेताओं, शीर्ष सीईओ और विख्यात वैज्ञानिकों की प्रेरक कहानियां भी बताते हैं, जिन्होंने उत्पादक, उत्प्रेरित और प्रसन्न बने रहने के लिए छोटी आदतों के विज्ञान को अपनाया है।
Author Biography
जेम्स क्लियर आदतों को विकसित करने, निर्णय लेने की क्षमता और निरंतर सुधार से जुड़े विषयों पर केंद्रित लेखक और वक्ता हैं। उनके कार्यों का प्रकाशन द न्यू यॉर्क टाइम्स, टाइम और आन्त्रप्रेन्योर में हो चुका है। वे सीबीएस के दिस मॉर्निंग शो में भी आ चुके हैं। उनकी वेबसाइट को हर माह लाखों लोग देखते हैं और यही नहीं, लाखों लोग उनके लोकप्रिय न्यूज़लेटर को सब्स्क्राइब भी कर चुके हैं। फ़ॉर्चून 500 कंपनियों में वे नियमित रूप से व्याख्यान देते रहे हैं। उनके कार्यों का इस्तेमाल एनएफएल, एनबीए और एमएलबी में अनेक टीमों ने किया है। द हैबिट्स अकैडमी के ऑनलाइन कोर्स के माध्यम से क्लियर ने 10,000 से ज़्यादा लीडरों, मैनेजरों, प्रशिक्षकों और शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया है। द हैबिट्स अकैडमी उन लोगों और संगठनों के लिए प्रशिक्षण का प्रमुख मंच है, जो जीवन और कार्यक्षेत्र में बेहतर आदतें विकसित करने में रुचि रखते हैं। क्लियर एक उत्साही वेटल़िफ़्टर और फ़ोटोग्राफर भी हैं। वे कोलंबस, ओहायो में अपनी पत्नी के साथ रहते हैं।
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Book Summary
जेम्स क्लियर की पुस्तक "एटॉमिक हैबिट्स" (Atomic Habits) आत्म-सुधार और आदतों के मनोविज्ञान पर लिखी गई सबसे प्रभावशाली किताबों में से एक है। इस किताब का मुख्य संदेश यह है कि बड़ी सफलताएं अचानक नहीं मिलतीं, बल्कि वे छोटी-छोटी आदतों का परिणाम होती हैं। क्लियर इसे 'एटॉमिक हैबिट्स' कहते हैं, यानी ऐसी आदतें जो एक परमाणु की तरह छोटी और सूक्ष्म तो हैं, लेकिन उनमें असीमित ऊर्जा और बदलाव लाने की क्षमता होती है। लेखक का मानना है कि यदि आप हर दिन सिर्फ एक प्रतिशत बेहतर बनने का लक्ष्य रखते हैं, तो साल के अंत तक आप खुद में 37 गुना सुधार कर चुके होंगे। यह किताब हमें बताती है कि समस्या हमारे लक्ष्यों में नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम (प्रक्रिया) में होती है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि हम अक्सर बड़े लक्ष्यों के पीछे भागते हैं, लेकिन वे लक्ष्य हमें तब तक सफलता नहीं दिला सकते जब तक हम उन्हें पाने की प्रक्रिया यानी अपनी आदतों में सुधार न करें। किसी आदत को बदलने के लिए क्लियर ने चार चरणों वाला एक सरल मॉडल दिया है जिसे 'हैबिट लूप' कहते हैं: संकेत (Cue), लालसा (Craving), प्रतिक्रिया (Response), और इनाम (Reward)। यह लूप हमारे मस्तिष्क में किसी भी आदत को मजबूती से बैठा देता है। यदि हम किसी बुरी आदत को छोड़ना चाहते हैं, तो हमें इसी प्रक्रिया में बदलाव करना होगा।
किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमारी पहचान (Identity) से जुड़ा है। क्लियर का तर्क है कि आदतों को बदलने का सबसे गहरा स्तर 'परिणाम' या 'प्रक्रिया' नहीं, बल्कि 'पहचान' में बदलाव लाना है। उदाहरण के लिए, यदि आप सिगरेट छोड़ना चाहते हैं और कोई आपको सिगरेट ऑफर करे, तो यह कहना कि "नहीं, मैं कोशिश कर रहा हूँ" एक अस्थायी बदलाव है। लेकिन यह कहना कि "नहीं, मैं धूम्रपान नहीं करता," आपकी पहचान को ही बदल देता है। जब आपकी आदतें आपकी पहचान का हिस्सा बन जाती हैं, तो उन्हें बनाए रखना बहुत आसान हो जाता है।
अच्छी आदतों को अपनाने के लिए लेखक ने चार नियम बताए हैं। पहला नियम है, संकेत को स्पष्ट बनाना। यदि आप व्यायाम करना चाहते हैं, तो अपने वर्कआउट के कपड़े रात को ही सामने रख दें। दूसरा नियम है, आदत को आकर्षक बनाना। अपने किसी काम के साथ किसी ऐसी चीज को जोड़ें जिसे आप पसंद करते हैं। तीसरा नियम है, आदत को आसान बनाना। क्लियर कहते हैं कि किसी भी नई आदत की शुरुआत करने के लिए उसे इतना सरल बना दें कि उसे करने में दो मिनट से ज्यादा का समय न लगे। इसे 'टू-मिनट रूल' कहा जाता है। चौथा नियम है, उसे संतोषजनक बनाना। आदत पूरी करने पर खुद को छोटा सा इनाम दें ताकि आपका दिमाग अगली बार उस आदत को दोहराने के लिए उत्साहित रहे।
बुरी आदतों को छोड़ने के लिए, लेखक ने इन्हीं नियमों को उलट देने की सलाह दी है। इसे अदृश्य बना दें, अनाकर्षक बना दें, कठिन बना दें और असंतोषजनक बना दें। उदाहरण के लिए, यदि आपको फोन की लत है, तो फोन को दूसरे कमरे में रख दें ताकि उसका संकेत (Cue) ही आपको न मिले। जब किसी काम को करना कठिन हो जाता है, तो हमारा मस्तिष्क उसे करने से बचने लगता है। यह तरीका बहुत ही व्यावहारिक है क्योंकि यह इच्छाशक्ति (Willpower) पर निर्भर रहने के बजाय पर्यावरण को बदलने पर जोर देता है।
किताब में 'पर्यावरण के डिजाइन' पर बहुत जोर दिया गया है। लेखक का मानना है कि हम अपने परिवेश के गुलाम होते हैं। अगर आप स्वस्थ भोजन करना चाहते हैं, तो अपने किचन के सामने वाले काउंटर पर फल रखें और जंक फूड को अलमारी के अंदर छिपा दें। छोटे-छोटे बदलाव जो हमारे आस-पास के माहौल को प्रभावित करते हैं, वे हमारी आदतों को स्वतः ही नियंत्रित करने लगते हैं। अक्सर हमें लगता है कि हमें आत्म-अनुशासन की जरूरत है, जबकि वास्तव में हमें बस एक ऐसे परिवेश की जरूरत है जो सही निर्णय लेना आसान बना दे।
एक और दिलचस्प पहलू 'हैबिट स्टैकिंग' (Habit Stacking) है। इसका अर्थ है कि एक पुरानी आदत के साथ एक नई आदत को जोड़ना। जैसे, सुबह ब्रश करने के तुरंत बाद आप मेडिटेशन करने की आदत डाल सकते हैं। इस तरह, पुरानी आदत एक ट्रिगर की तरह काम करती है जो नई आदत के लिए संकेत प्रदान करती है। यह विधि नई आदतों को जीवन में उतारने का सबसे प्रभावी तरीका है क्योंकि इसमें हमें कुछ भी नया नहीं करना पड़ता, बस मौजूदा दिनचर्या में थोड़ा समायोजन करना होता है।
अंत में, जेम्स क्लियर हमें याद दिलाते हैं कि आदतें ही वह आधार हैं जिस पर हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, कोई मंजिल नहीं। हम हमेशा बेहतर बनते रह सकते हैं। कभी-कभी हम अपनी आदतों से भटक सकते हैं, लेकिन लेखक कहते हैं कि "कभी भी दो बार न चूकें।" यानी एक दिन की चूक आपको असफल नहीं बनाती, लेकिन दोबारा चूकना एक नई आदत की शुरुआत हो सकती है। यह किताब हमें सिखाती है कि धैर्य रखें, अपनी प्रक्रियाओं पर ध्यान दें और छोटे-छोटे सुधारों की शक्ति पर भरोसा करें। यह केवल आदतों के बारे में नहीं है, बल्कि यह इस बारे में है कि आप कौन बनना चाहते हैं और उसे प्राप्त करने के लिए आप हर दिन खुद को कैसे ढालते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, आपकी आदतें ही आपका व्यक्तित्व बनाती हैं।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि हम अक्सर बड़े लक्ष्यों के पीछे भागते हैं, लेकिन वे लक्ष्य हमें तब तक सफलता नहीं दिला सकते जब तक हम उन्हें पाने की प्रक्रिया यानी अपनी आदतों में सुधार न करें। किसी आदत को बदलने के लिए क्लियर ने चार चरणों वाला एक सरल मॉडल दिया है जिसे 'हैबिट लूप' कहते हैं: संकेत (Cue), लालसा (Craving), प्रतिक्रिया (Response), और इनाम (Reward)। यह लूप हमारे मस्तिष्क में किसी भी आदत को मजबूती से बैठा देता है। यदि हम किसी बुरी आदत को छोड़ना चाहते हैं, तो हमें इसी प्रक्रिया में बदलाव करना होगा।
किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमारी पहचान (Identity) से जुड़ा है। क्लियर का तर्क है कि आदतों को बदलने का सबसे गहरा स्तर 'परिणाम' या 'प्रक्रिया' नहीं, बल्कि 'पहचान' में बदलाव लाना है। उदाहरण के लिए, यदि आप सिगरेट छोड़ना चाहते हैं और कोई आपको सिगरेट ऑफर करे, तो यह कहना कि "नहीं, मैं कोशिश कर रहा हूँ" एक अस्थायी बदलाव है। लेकिन यह कहना कि "नहीं, मैं धूम्रपान नहीं करता," आपकी पहचान को ही बदल देता है। जब आपकी आदतें आपकी पहचान का हिस्सा बन जाती हैं, तो उन्हें बनाए रखना बहुत आसान हो जाता है।
अच्छी आदतों को अपनाने के लिए लेखक ने चार नियम बताए हैं। पहला नियम है, संकेत को स्पष्ट बनाना। यदि आप व्यायाम करना चाहते हैं, तो अपने वर्कआउट के कपड़े रात को ही सामने रख दें। दूसरा नियम है, आदत को आकर्षक बनाना। अपने किसी काम के साथ किसी ऐसी चीज को जोड़ें जिसे आप पसंद करते हैं। तीसरा नियम है, आदत को आसान बनाना। क्लियर कहते हैं कि किसी भी नई आदत की शुरुआत करने के लिए उसे इतना सरल बना दें कि उसे करने में दो मिनट से ज्यादा का समय न लगे। इसे 'टू-मिनट रूल' कहा जाता है। चौथा नियम है, उसे संतोषजनक बनाना। आदत पूरी करने पर खुद को छोटा सा इनाम दें ताकि आपका दिमाग अगली बार उस आदत को दोहराने के लिए उत्साहित रहे।
बुरी आदतों को छोड़ने के लिए, लेखक ने इन्हीं नियमों को उलट देने की सलाह दी है। इसे अदृश्य बना दें, अनाकर्षक बना दें, कठिन बना दें और असंतोषजनक बना दें। उदाहरण के लिए, यदि आपको फोन की लत है, तो फोन को दूसरे कमरे में रख दें ताकि उसका संकेत (Cue) ही आपको न मिले। जब किसी काम को करना कठिन हो जाता है, तो हमारा मस्तिष्क उसे करने से बचने लगता है। यह तरीका बहुत ही व्यावहारिक है क्योंकि यह इच्छाशक्ति (Willpower) पर निर्भर रहने के बजाय पर्यावरण को बदलने पर जोर देता है।
किताब में 'पर्यावरण के डिजाइन' पर बहुत जोर दिया गया है। लेखक का मानना है कि हम अपने परिवेश के गुलाम होते हैं। अगर आप स्वस्थ भोजन करना चाहते हैं, तो अपने किचन के सामने वाले काउंटर पर फल रखें और जंक फूड को अलमारी के अंदर छिपा दें। छोटे-छोटे बदलाव जो हमारे आस-पास के माहौल को प्रभावित करते हैं, वे हमारी आदतों को स्वतः ही नियंत्रित करने लगते हैं। अक्सर हमें लगता है कि हमें आत्म-अनुशासन की जरूरत है, जबकि वास्तव में हमें बस एक ऐसे परिवेश की जरूरत है जो सही निर्णय लेना आसान बना दे।
एक और दिलचस्प पहलू 'हैबिट स्टैकिंग' (Habit Stacking) है। इसका अर्थ है कि एक पुरानी आदत के साथ एक नई आदत को जोड़ना। जैसे, सुबह ब्रश करने के तुरंत बाद आप मेडिटेशन करने की आदत डाल सकते हैं। इस तरह, पुरानी आदत एक ट्रिगर की तरह काम करती है जो नई आदत के लिए संकेत प्रदान करती है। यह विधि नई आदतों को जीवन में उतारने का सबसे प्रभावी तरीका है क्योंकि इसमें हमें कुछ भी नया नहीं करना पड़ता, बस मौजूदा दिनचर्या में थोड़ा समायोजन करना होता है।
अंत में, जेम्स क्लियर हमें याद दिलाते हैं कि आदतें ही वह आधार हैं जिस पर हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, कोई मंजिल नहीं। हम हमेशा बेहतर बनते रह सकते हैं। कभी-कभी हम अपनी आदतों से भटक सकते हैं, लेकिन लेखक कहते हैं कि "कभी भी दो बार न चूकें।" यानी एक दिन की चूक आपको असफल नहीं बनाती, लेकिन दोबारा चूकना एक नई आदत की शुरुआत हो सकती है। यह किताब हमें सिखाती है कि धैर्य रखें, अपनी प्रक्रियाओं पर ध्यान दें और छोटे-छोटे सुधारों की शक्ति पर भरोसा करें। यह केवल आदतों के बारे में नहीं है, बल्कि यह इस बारे में है कि आप कौन बनना चाहते हैं और उसे प्राप्त करने के लिए आप हर दिन खुद को कैसे ढालते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, आपकी आदतें ही आपका व्यक्तित्व बनाती हैं।
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