Deewar Mein Ek Khidki Rahti Thi । दीवार में एक खिड़की रहती थी [ साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत

Vinod Kumar Shukla

Paperback • 248 Pages • ₹ 299.00 • Hindi • 9789392820786
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Publisher Hind Yugm
ISBN13 9789392820786
ASIN/SKU 939282078X
Book Format Paperback
Language Hindi
Pages 248
List Price ₹ 299.00
Publishing Date 26/12/2023
Dimensions 12.9 x 1.7 x 19.8 cm
Weight 185 g
Book Code BD00055028

Discover Deewar Mein Ek Khidki Rahti Thi । दीवार में एक खिड़की रहती थी [ साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत by Vinod Kumar Shukla. This book is published by Hind Yugm in Paperback format, ISBN 9789392820786, ASIN 939282078X, under Literature and Fiction, Indian Writing, Contemporary Fiction.

Book Description

विनोद कुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष, कोई युग-सत्य, कोई उद्देश्य या संदेश नहीं है क्योंकि इसमें वह जीवन, जो इस देश की वह ज़िंदगी है जिसे किसी अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्न-मध्यवर्गीय कहा जाता है, इतने खालिस रूप में मौजूद है कि उन्हें किसी पिष्टकथ्य की ज़रूरत नहीं है। यहाँ खलनायक नहीं हैं किंतु मुख्य पात्रों के अस्तित्व की सादगी, उनकी निरीहता, उनके रहने, आने-जाने, जीवन-यापन के वे विरल ब्यौरे हैं जिनसे अपने-आप उस क्रूर प्रतिसंसार का एहसास हो जाता है जिसके कारण इस देश के बहुसंख्य लोगों का जीवन वैसा है जैसा कि है। विनोद कुमार शुक्ल इस जीवन में बहुत गहरे पैठकर दाम्पत्य, परिवार, आस-पड़ोस, काम करने की जगह, स्नेहिल ग़ैर-संबंधियों के साथ रिश्तों के ज़रिए एक इतनी अदम्य आस्था स्थापित करते हैं कि उसके आगे सारी अनुपस्थित मानव-विरोधी ताक़तें कुरूप ही नहीं, खोखली लगने लगती हैं। एक सुखदतम अचंभा यह है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों, सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्र, हवा, रंग, गंध और ध्वनियों के साथ प्रकृति इतनी उपस्थित है जितनी फणीश्वरनाथ रेणु के गल्प के बाद कभी नहीं रही और जो यह समझते थे कि विनोद कुमार शुक्ल में मानव-स्नेहिलता कितनी भी हो, स्त्री-पुरुष प्रेम से वे परहेज़ करते हैं या क्योंकि वह उनके बूते से बाहर है, उनके लिए तो यह उपन्यास एक सदमा साबित होगा–प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐंद्रिकता, माँसलता, रति और शृंगार के ऐसे चित्र दिए हैं जो बग़ैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौंदर्य से समृद्ध कर देते हैं, और वे चस्पाँ किए हुए नहीं हैं बल्कि नितांत स्वाभाविक हैं–उनके बिना यह उपन्यास अधूरा, अविश्वसनीय, वंध्य होता। बल्कि आश्चर्य यह है कि उनकी कविता में यह शारीरिकता नहीं है।
-विष्णु खरे

Author Biography

विनोद कुमार शुक्ल (जन्म : 1937) भारतीय-हिंदी साहित्य के एक अत्यंत समादृत हस्ताक्षर हैं। उन्होंने कविता और कथा में स्वयं को बरतते हुए एक ऐसी अभूतपूर्व भाषा संभव की जिसमें अचरज, सुख और सरोकार साथ-साथ चलते हैं—पठनीयता को बाधित किए बग़ैर। उनके नौ कविता-संग्रह, चार कहानी-संग्रह, छह उपन्यास प्रकाशित हैं। संसार की लगभग सभी बड़ी भाषाओं में उनकी रचनाएँ अनूदित हो चुकी हैं। वे रंगमंच और सिनेमा में उतरकर प्रशंसित-पुरस्कृत हो चुकी हैं। ‘गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप’, ‘राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘शिखर सम्मान’ (म.प्र. शासन), ‘हिंदी गौरव सम्मान’ (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान), ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान’, ‘रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार’ तथा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ प्राप्त विनोद कुमार शुक्ल को अंतरराष्ट्रीय साहित्य में उपलब्धि के लिए वर्ष 2023 के प्रतिष्ठित पेन/नाबोकोव पुरस्कार (PEN/Nabokov Award) से सम्मानित किया गया है।

Editorial Reviews

भाषा पर तो विनोद कुमार शुक्ल का अपने ढंग का अधिकार है ही-प्रेमचंद और जैनेंद्र के बाद इतनी सादा, रोज़मर्रा भाषा में शायद ही किसी और में अभिव्यक्ति की ऐसी क्षमता हो– लेकिन इस उपन्यास में उन्होंने संभाषण की कई भाषाएँ और शैलियाँ ईजाद की हैं–एक वह जिसमें रघुवर प्रसाद लोगों से बोलते हैं, दूसरी वह जिसमें वे ख़ुद से बोलते हैं, तीसरी वह जिसमें रघुवर प्रसाद और सोनसी अपने एकांत में बोलते हैं और चौथी वह जिसमें रघुवर प्रसाद परिवार आपस में बात करता है जिसमें हल्की-सी आंचलिकता मिली हुई है, और पाँचवीं वह जिसमें विभागाध्यक्ष और पाचार्य बोलते हैं–सबसे ‘ठेठ’ वही है। एक और अद्भुत भाषा वह है जिसमें बोलने वाला और सुननेवाला बारी-बारी कहते कुछ हैं और सुनते कुछ और हैं और यह एक और ही अर्थबाहुल्य स्निग्धता को जन्म देता है।
-विष्णु खरे

Book Summary

विनोद कुमार शुक्ल द्वारा रचित "दीवार में एक खिड़की रहती थी" हिंदी साहित्य के सबसे अनूठे, मार्मिक और प्रशंसित उपन्यासों में से एक है, जिसे इसके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। यह उपन्यास कोई पारंपरिक कहानी या तेज गति वाला आख्यान नहीं है, बल्कि यह भारतीय निम्न-मध्यमवर्गीय जीवन की सूक्ष्म बारीकियों, दैनिक संघर्षों और उसमें छिपे असीम सौंदर्य का एक बेहद काव्यात्मक और दार्शनिक चित्रण है। इस कृति में कोई बहुत बड़ी ऐतिहासिक उथल-पुथल, कोई महाकाव्यात्मक संघर्ष, कोई सनसनीखेज रहस्य या कोई तयशुदा खलनायक नहीं है। इसके बजाय, यह जीवन के उन बेहद छोटे, नीरस और साधारण पलों को अपने भीतर समेटता है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। शुक्ल जी की विशिष्ट लेखन शैली इस साधारण सी लगने वाली कहानी को जादुई यथार्थवाद के उस स्तर पर ले जाती है जहाँ यथार्थ और स्वप्न एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं।

उपन्यास की कथा मुख्य रूप से रघुवर प्रसाद और उनकी पत्नी सोनसी के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक छोटे से कस्बे में अपना जीवन बहुत ही खामोशी से व्यतीत कर रहे हैं। रघुवर प्रसाद पेशे से एक गणित के शिक्षक हैं, और उनका पूरा जीवन आर्थिक अभावों, सीमित संसाधनों तथा रोजमर्रा की एकरसता से घिरा हुआ है। उनके पास बहुत अधिक महत्वाकांक्षाएं, बड़े सपने या समाज में ऊपर उठने की कोई अंधी दौड़ नहीं है; उनका संघर्ष केवल एक सम्मानजनक, ईमानदार और शांत जीवन जीने तक सीमित है। रघुवर प्रसाद स्वभाव से बेहद अंतर्मुखी, संकोची और अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाले व्यक्ति हैं। दूसरी ओर, उनकी पत्नी सोनसी इस नीरस जीवन में प्रेम, मासूमियत, उल्लास और ताजगी की एक किरण लेकर आती हैं। इन दोनों के वैवाहिक जीवन में जो एक मूक, पवित्र और गहरा प्रेम है, उसे लेखक ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। उनका यह आपसी संबंध उस कठोर और संवेदनहीन दुनिया के खिलाफ एक मजबूत ढाल की तरह काम करता है, जो निम्न-मध्यम वर्ग को हर दिन अपने बोझ तले कुचलने का प्रयास करती है।

इस उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक हिस्सा वह खिड़की है, जो रघुवर प्रसाद के घर की दीवार में स्थित है। यह खिड़की केवल ईंट और चूने की दीवार में छूटी हुई एक खाली जगह मात्र नहीं है, बल्कि यह उनके सीमित, बंधे हुए और अभावग्रस्त जीवन में अनंत संभावनाओं, कल्पनाओं और बाहरी दुनिया के साथ संवाद का एक सशक्त माध्यम है। जब उनके छोटे से घर की चारदीवारी में घुटन या अकेलापन हावी होने लगता है, तो यह खिड़की उनके लिए एक पूरी नई दुनिया का दरवाजा खोल देती है। इसी खिड़की के माध्यम से वे बाहर खेलते हुए मासूम बच्चों को देखते हैं, प्रकृति के बदलते हुए विविध रंगों को महसूस करते हैं, और अपनी रुकी हुई कल्पनाओं को उड़ान भरने की आजादी देते हैं। यह खिड़की उस मानसिक और आत्मिक स्वतंत्रता का एक शाश्वत प्रतीक है, जिसे कोई भी गरीबी या सामाजिक मजबूरी कभी छीन नहीं सकती।

लेखक ने इस उपन्यास में प्रकृति को केवल एक मूक दर्शक या पृष्ठभूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक सक्रिय और जीवंत पात्र के रूप में चित्रित किया है। सूरज का नियमित रूप से उगना और ढलना, बादलों का घिरना, बारिश की बूंदों का गिरना, पेड़-पौधे और यहाँ तक कि गली से गुजरने वाला एक विशाल हाथी भी कहानी में गहरे प्रतीकात्मक अर्थ लिए हुए उपस्थित होते हैं। प्रकृति की यह सर्वव्यापी उपस्थिति उनके जीवन की तमाम भौतिक कमियों को एक अजीब सी आध्यात्मिक पूर्णता से भर देती है। रघुवर प्रसाद जब उस हाथी को देखते हैं, तो वे अपनी साधारणता और उसकी राजसी विशालता की तुलना करते हैं, जो समाज में सफलता, रुतबे और उपलब्धियों का एक रूपक भी प्रतीत होता है। उपन्यास में जल, वायु, आकाश और मूक जानवरों के प्रति जो आत्मीयता दिखाई गई है, वह यह स्थापित करती है कि इंसान भले ही कितनी भी आर्थिक तंगी का शिकार हो, वह इस ब्रह्मांड और प्रकृति के विस्तृत कैनवास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रघुवर प्रसाद और सोनसी के इर्द-गिर्द का मोहल्ला, उनके पड़ोसी, खेलते हुए बच्चे और रोजमर्रा की छोटी-छोटी जरूरतें—यह सब मिलकर एक ऐसा सजीव ताना-बाना बुनते हैं जो पाठक को पूरी तरह से यथार्थवादी लगता है। लेखक ने बड़ी ही सूक्ष्मता से यह दिखाया है कि कैसे एक आम आदमी अपने छोटे-छोटे जुगाड़ों और अपनी छोटी-छोटी खुशियों में ही पूरा ब्रह्मांड खोज लेता है। यहाँ पति-पत्नी के बीच के संवाद बहुत ही सरल, कई बार बचकाने, लेकिन भीतर से बेहद गहरे, अर्थपूर्ण और दार्शनिक होते हैं। यह उपन्यास हमें यह बुनियादी बात सिखाता है कि जीवन को संपूर्णता से जीने के लिए किसी बहुत बड़े उद्देश्य, अपार धन या सामाजिक सफलता की आवश्यकता नहीं है; बस एक-दूसरे का सच्चा साथ, थोड़ी सी समझ और दीवार में एक खुली हुई खिड़की ही काफी होती है।

निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि "दीवार में एक खिड़की रहती थी" केवल एक उपन्यास भर नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रति एक गहरा ध्यान (meditation) है। विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी इस अप्रतिम रचना के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं, प्रेम और अस्तित्व की गहराई को एक बिल्कुल नए और अचंभित करने वाले आयाम में छुआ है। यह हमें यह देखने की दृष्टि देता है कि अगर हमारे पास महसूस करने वाला हृदय हो, तो एक बेहद साधारण, अभावग्रस्त और उबाऊ जीवन के भीतर भी कविता, संगीत और जादू ढूंढा जा सकता है। यह उपन्यास अपनी सादगी में इतना समृद्ध है कि यह पाठक के मन-मस्तिष्क पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है।

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